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Thursday, September 29, 2011

बारात की वापसी

यह व्यंग स्व. श्री हरिशंकर परसाई द्वारा लिखा गया है|

बारात में जाना कई कारण से टालता हूँ । मंगल कार्यों में हम जैसी चढ़ी उम्र के कुँवारों का जाना अपशकुन है। महेश बाबू का कहना है, हमें मंगल कार्यों से विधवाओं की तरह ही दूर रहना चाहिये। किसी का अमंगल अपने कारण क्यों हो ! उन्हें पछतावा है कि तीन साल पहले जिनकी शादी में वह गये थे, उनकी तलाक की स्थिति पैदा हो गयी है। उनका यह शोध है कि महाभारत का युद्ध न होता, अगर भीष्म की शादी हो गयी होती। और अगर कृष्णमेनन की शादी हो गयी होती, तो चीन हमला न करता।

सारे युद्ध प्रौढ़ कुंवारों के अहं की तुष्टि के लिए होते हैं। 1948 में तेलंगाना में किसानों का सशस्त्र विद्रोह देश के वरिष्ठ कुंवारे विनोवस भावे के अहं की तुष्टि के लिए हुआ था। उनका अहं भूदान के रूप में तुष्ट हुआ।

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अपने पुत्र की सफल बारात से प्रसन्न मायराम के मन में उस दिन नागपुर में बड़ा मौलिक विचार जागा था। कहने लगे, " बस, अब तुमलोगों की बारात में जाने की इच्छा है। " हम लोगों ने कहा - ' अब किशोरों जैसी बारात तो होगी नही। अब तो ऐसी बारात ऐसी होगी- किसी को भगा कर लाने के कारण हथकड़ी पहने हम होंगे और पीछे चलोगे तुम जमानत देने वाले। ऐसी बारात होगी। चाहो तो बैण्ड भी बजवा सकते हो।"

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विवाह का दृश्य बड़ा दारुण होता है। विदा के वक्त औरतों के साथ मिलकर रोने को जी करता है। लड़की के बिछुड़ने के कारण नहीं, उसके बाप की हालत देखकर लगता है, इस देश की आधी ताकत लड़कियों की शादी करने मे जा रही है। पाव ताकत छिपाने मे जा रही है - शराब पीकर छिपाने में, प्रेम करके छिपाने में, घूस लेकर छिपाने में ... बची पाव ताकत से देश का निर्माण हो रहा है, - तो जितना हो रहा है, बहुत हो रहा है। आखिर एक चौथाई ताकत से कितना होगा।

यह बात मैंने उस दिन एक विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के वार्षिकोत्सव में कही थी। कहा था, “तुम लोग क्रांतिकारी तरुण-तरुणियां बनते हो। तुम इस देश की आधी ताकत को बचा सकते हो। ऐसा करो जितनी लड़कियां विश्वविद्यालय में हैं, उनसे विवाह कर डालो। अपने बाप को मत बताना। वह दहेज मांगने लगेगा। इसके बाद जितने लड़के बचें, वे एक-दूसरे की बहन से शादी कर लें। ऐसा बुनियादी क्रांतिकारी काम कर डालो और फिर जिस सिगड़ी को जमीन पर रखकर तुम्हारी मां रोटी बनाती है, उसे टेबिल पर रख दो, जिससे तुम्हारी पत्नी सीधी खड़ी होकर रोटी बना सके। बीस-बाईस सालों में सिगड़ी ऊपर नहीं रखी जा सकी और न झाडू में चार फुट का डंडा बांधा जा सका। अब तक तुम लोगों ने क्या खाक क्रांति की है।”

छात्र थोड़े चौंके। कुछ ही-ही करते भी पाये गये। मगर कुछ नहीं।

एक तरुण के साथ सालों मेहनत करके मैंने उसके खयालात संवारे थे। वह शादी के मंडप में बैठा तो ससुर से बच्चे की तरह मचलकर बोला, “बाबूजी, हम तो वेस्पा लेंगे, वेस्पा के बिना कौर नहीं उठायेंगे।” लड़की के बाप का चेहरा फक। जी हुआ, जूता उतारकर पांच इस लड़के को मारूं और पच्चीस खुद अपने को। समस्या यों सुलझी कि लड़की के बाप ने साल भर में वेस्पा देने का वादा किया, नेग के लिए बाजार से वेस्पा का खिलौना मंगाकर थाली में रखा, फिर सबा रुपया रखा और दामाद को भेंट किया। सबा रुपया तो मरते वक्त गोदान के निमित्त दिया जाता है न। हां, मेरे उस तरुण दोस्त की प्रगतिशीलता का गोदान हो रहा था।

बारात यात्रा से मैं बहुत घबराता हूँ , खासकर लौटते वक्त जब बाराती बेकार बोझ हो जाता है । अगर जी भर दहेज न मिले, तो वर का बाप बरातियों को दुश्मन समझता है। मैं सावधानी बरतता हूँ कि बारात की विदा के पहले ही कुछ बहाना करके किराया लेकर लौट पड़ता हूँ।

एक बारात की वापसी मुझे याद है।

हम पांच मित्रों ने तय किया कि शाम ४ बजे की बस से वापस चलें। पन्ना से इसी कम्पनी की बस सतना के लिये घण्टे-भर बाद मिलती है, जो जबलपुर की ट्रेन मिला देती है। सुबह घर पहुंच जायेंगे। हममें से दो को सुबह काम पर हाज़िर होना था, इसलिये वापसी का यही रास्ता अपनाना ज़रूरी था। लोगों ने सलाह दी कि समझदार आदमी इस शाम वाली बस से सफ़र नहीं करते। क्या रास्ते में डाकू मिलते हैं? नहीं बस डाकिन है।

बस को देखा तो श्रद्धा उभर पड़ी। खूब वयोवृद्ध थी। सदीयों के अनुभव के निशान लिये हुए थी। लोग इसलिए सफ़र नहीं करना चाहते कि वृद्धावस्था में इसे कष्ट होगा। यह बस पूजा के योग्य थी। उस पर सवार कैसे हुआ जा सकता है!

बस-कम्पनी के एक हिस्सेदार भी उसी बस से जा रहे थे। हमनें उनसे पूछा-यह बस चलती है? वह बोले-चलती क्यों नहीं है जी! अभी चलेगी। हमनें कहा-वही तो हम देखना चाहते हैं। अपने-आप चलती है यह? उन्होंने कहा-हां जी और कैसे चलेगी?

गज़ब हो गया। ऐसी बस अपने-आप चलती है!

हम आगा-पीछा करने लगे। पर डाक्टर मित्र ने कहा-डरो मत, चलो! बस अनुभवी है। नई-नवेली बसों से ज़्यादा विशवनीय है। हमें बेटों की तरह प्यार से गोद में लेकर चलेगी। हम बैठ गये। जो छोड़ने आए थे, वे इस तरह देख रहे थे, जैसे अंतिम विदा दे रहे हैं। उनकी आखें कह रही थी - आना-जाना तो लगा ही रहता है। आया है सो जायेगा - राजा, रंक, फ़कीर। आदमी को कूच करने के लिए एक निमित्त चाहिए।

इंजन सचमुच स्टार्ट हो गया। ऐसा लगा, जैसे सारी बस ही इंजन है और हम इंजन के भीतर बैठे हैं। कांच बहुत कम बचे थे। जो बचे थे, उनसे हमें बचना था। हम फौरन खिड़की से दूर सरक गये। इंजन चल रहा था। हमें लग रहा था हमारी सीट के नीचे इंजन है।

बस सचमुच चल पड़ी और हमें लगा कि गांधीजी के असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदलनों के वक्त अवश्य जवान रही होगी। उसे ट्रेनिंग मिल चुकी थी। हर हिस्सा दुसरे से असहयोग कर रहा था। पूरी बस सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौर से गुज़र रही थी। सीट का बॉडी से असहयोग चल रहा था। कभी लगता, सीट बॉडी को छोड़ कर आगे निकल गयी। कभी लगता कि सीट को छोड़ कर बॉडी आगे भागे जा रही है। आठ-दस मील चलने पर सारे भेद-भाव मिट गए। यह समझ में नहीं आता था कि सीट पर हम बैठे हैं या सीट हमपर बैठी है।

एकाएक बस रूक गयी। मालूम हुआ कि पेट्रोल की टंकी में छेद हो गया है। ड्राइवर ने बाल्टी में पेट्रोल निकाल कर उसे बगल में रखा और नली डालकर इंजन में भेजने लगा। अब मैं उम्मीद कर रहा था कि थोड़ी देर बाद बस कम्पनी के हिस्सेदार इंजन को निकालकर गोद में रख लेंगे और उसे नली से पेट्रोल पिलाएंगे, जैसे मां बच्चे के मुंह में दूध की शीशी लगाती है।

बस की रफ्तार अब पन्द्रह-बीस मील हो गयी थी। मुझे उसके किसी हिस्से पर भरोसा नहीं था। ब्रेक फेल हो सकता है, स्टीयरींग टूट सकता है। प्रकृति के दृश्य बहुत लुभावने थे। दोनों तरफ हरे-हरे पेड़ थे, जिन पर पंछी बैठे थे। मैं हर पेड़ को अपना दुश्मन समझ रहा था। जो भी पेड़ आता, डर लगता कि इससे बस टकराएगी। वह निकल जाता तो दूसरे पेड़ का इन्तज़ार करता। झील दिखती तो सोचता कि इसमें बस गोता लगा जाएगी।

एकाएक फिर बस रूकी। ड्राइवर ने तरह-तरह की तरकीबें कीं, पर वह चली नहीं। सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हो गया था। कम्पनी के हिस्सेदार कह रहे थे - बस तो फर्स्ट क्लास है जी! ये तो इत्तफाक की बात है। क्षीण चांदनी में वृक्षों की छाया के नीचे वह बस बड़ी दयनीय लग रही थी। लगता, जैसे कोई वृद्धा थककर बैठ गयी हो। हमें ग्लानी हो रही थी कि इस बेचारी पर लदकर हम चले आ रहे हैं। अगर इसका प्राणांत हो गया तो इस बियाबान में हमें इसकी अन्त्येष्टी करनी पड़ेगी।

हिस्सेदार साहब ने इंजन खोला और कुछ सुधारा। बस आगे चली। उसकी चाल और कम हो गयी थी।

धीरे-धीरे वृद्धा की आखों की ज्योति जाने लगी। चांदनी में रास्ता टटोलकर वह रेंग रही थी। आगे या पीछे से कोई गाड़ी आती दिखती तो वह एकदम किनारे खड़ी हो जाती और कहती - निकल जाओ बेटी! अपनी तो वह उम्र ही नहीं रही।

एक पुलिया के उपर पहुंचे ही थे कि एक टायर फिस्स करके बैठ गया। बस बहुत ज़ोर से हिलकर थम गयी। अगर स्पीड में होती तो उछल कर नाले में गिर जाती। मैंने उस कम्पनी के हिस्सेदार की तरफ श्रद्धा भाव से देखा। वह टायरों क हाल जानते हैं, फिर भी जान हथेली पर ले कर इसी बस से सफर करते हैं। उत्सर्ग की ऐसी भावना दुर्लभ है। सोचा, इस आदमी के साहस और बलिदान-भावना का सही उपयोग नहीं हो रहा है। इसे तो किसी क्रांतिकारी आंदोलन का नेता होना चाहिए। अगर बस नाले में गिर पड़ती और हम सब मर जाते, तो देवता बांहें पसारे उसका इन्तज़ार करते। कहते - वह महान आदमी आ रहा है जिसने एक टायर के लिए प्राण दे दिए। मर गया, पर टायर नहीं बदला।

दूसरा घिसा टायर लगाकर बस फिर चली। अब हमने वक्त पर पन्ना पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। पन्ना कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी - पन्ना, क्या, कहीं भी, कभी भी पहुंचने की उम्मीद छोड़ दी थी। लगता था, ज़िन्दगी इसी बस में गुज़ारनी है और इससे सीधे उस लोक की ओर प्रयाण कर जाना है। इस पृथ्वी पर उसकी कोई मंज़िल नहीं है। हमारी बेताबी, तनाव खत्म हो गये। हम बड़े इत्मीनान से घर की तरह बैठ गये। चिन्ता जाती रही। हंसी मज़ाक चालू हो गया।

ठण्ड बढ़ रही थी । खिड़कियाँ खुली ही थीं। डाक्टर ने कहा - ' गलती हो गयी। 'कुछ' पीने को ले आता तो ठीक रहता । ' एक गाँव पर बस रुकी तो डाक्टर फौरन उतरा । ड्राइवर से बोला - 'जरा रोकना ! नारियल ले आऊँ । आगे मढ़िया पर फोड़ना है । डाक्टर झोपड़ियों के पीछे गया और देशी शराब की बोतल ले आया । छागलों मे भर कर हम लोगों ने पीना शुरु किया ।

इसके बाद किसी कष्ट का अनुभव नहीं हुआ। पन्ना से पहले ही सारे मुसाफिर उतर चुके थे । बस कम्पनी के हिस्सेदार शहर के बाहर ही अपने घर पर उतर गये। बस शहर मे अपने ठिकाने पर रुकी। कम्पनी के दो मालिक रजाइयों मे दुबके बैठे थे। रात का एक बजा था। हम पाँचों उतरे। मैं सड़क के किनारे खड़ा रहा। डाक्टर भी मेरे पास खड़ा हो कर बोतल से अंतिम घूँट लेने लगा। बाकि तीन मित्र बस-मालिकों पर झपटे। उनकी गर्म डाँट हम सुन रहे थे। पर वे निराश लौटे। बस-मालिकों ने कह दिया था, सतना की बस तो चार- पाँच घण्टे पहले जा चुकी थी। अब लौटती होगी। अब तो बस सवेरे ही मिलेगी।

आसपास देखा, सारी दुकानें, होटल बन्द। ठण्ड कड़ाके की। भूख भी खूब लग रही थी। तभी डाक्टर बस-मालिकों के पास गया। पाँचेक मिनट मे उनके साथ लौटा तो बदला हुआ था। बड़े अदब से मुझसे कहने लगा," सर, नाराज़ मत होइए। सरदार जी कुछ इंतजाम करेंगे। सर,सर उन्हें अफ़सोस है कि आपको तक़लीफ़ हुई। "

अभी डाक्टर बेतकुल्लफी से बात कर रहा था और अब मुझे 'सर' कह रहा है। बात क्या है? कही ठर्रा ज्यादा असर तो नहीं कर गया। मैने कहा, "यह तुमने क्या 'सर-सर' लगा रखी है ? "

उसने वैसे ही झुक कर कहा, " सर, नाराज़ मत होइए ! सर, कुछ इंतजाम हुआ जाता है। "

मुझे तब भी कुछ समझ में नही आया। डाक्टर भी परेशान था कि मैं कुछ समझ क्यों नही रहा हूँ। वह मुझे अलग ले गया और समझाया, " मैने इन लोगों से कहा है कि तुम संसद सदस्य हो। इधर जांच करने आए हो।मैं एक क्लर्क हूँ, जिसे साहब ने एम. पी. को सतना पहुँचाने के लिए भेजा है। मैने इनसे कहा कि सरदारजी, मुझ गरीब की तो गर्दन कटेगी ही, आपकी भी लेवा-देई हो जायेगी। वह स्पेशल बस से सतना भेजने का इंतजाम कर देगा। ज़रा थोड़ा एम. पी. पन तो दिखाओ। उल्लू की तरह क्यों पेश आ रहे हो। "

मैं समझ गया कि मेरी काली शेरवानी काम आ गयी है। यह काली शेरवानी और ये बड़े बाल मुझे कोई रुप दे देते हैं। नेता भी दिखता हूँ, शायर भी और अगर बाल सूखे -बिखरे हों तो जुम्मन शहनाईवाले का भी धोखा हो जाता है।

मैने मिथ्याचार का आत्मबल बटोरा और लौटा तो ठीक संसद सदस्य की तरह। आते ही सरदारजी से रोब से पूछा, " सरदारजी, आर. टी. ओ. से कब तक इस बस को चलाने का सौदा हो गया है? "

सरदारजी घबरा उठे। डाक्टर खुश कि मैने फर्स्ट क्लास रोल किया है।

रोबदार संसद सदस्य का एक वाक्य काफ़ी है, यह सोंचकर मैं दूर खड़े होकर सिगरेट पीने लगा। सरदारजी ने वहीं मेरे लिये कुर्सी डलवा दी। वह डरे हुए थे और डरा हुआ मैं भी था। मेरा डर यह था कि कहीं पूछताछ होने लगी कि मैं कौन संसद सदस्य हूँ तो क्या कहूँगा। याद आया कि अपने मित्र महेशदत्त मिश्र का नाम धारण कर लूँगा। गाँधीवादी होने के नाते, वह थोड़ा झूठ बोलकर मुझे बचा ही लेंगे।

मेरा आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया। झूठ यदि जम जाये तो सत्य से ज्यादा अभय देता है। मैं वहीं बैठे-बैठे डाक्टर से चीखकर बोला, " बाबू , यहाँ क्या कयामत तक बैठे रहना पड़ेगा? इधर कहीं फोन हो तो जरा कलेक्टर को इत्तिला कर दो। वह ग़ाड़ी का इंतजाम कर देंगे। "

डाक्टर वहीं से बोला, " सर, बस एक मिनट! जस्ट ए मिनट सर !" थोड़ी देर बाद सरदारजी ने एक नयी बस निकलवायी। मुझे सादर बैठाया गया। साथियों को बैठाया। बस चल पड़ी।

मुझे एम. पी. पन काफी भाड़ी पड़ रहा था। मैं दोस्तों के बीच अजनबी की तरह अकड़ा बैठा था। डाक्टर बार बार 'सर' कहता था और बस का मालिक 'हुज़ूर'।

सतना में जब रेलवे के मुसाफिरखाने मे पहुँचे तब डाक्टर ने कहा, " अब तीन घण्टे लगातार तुम मुझे 'सर' कहो। मेरी बहुत तौहीन हो चुकी है।"

Wednesday, September 21, 2011

लिट्टी चोखा

लिट्टी चोखा बिहार झारखन्ड में खायी जाने वाली पारम्परिक स्वादिष्ट डिश हैं इसे आप लन्च, डिनर या छुट्टी के दिन बना कर खाइये बहुत ही अच्छी लगेगी, लिट्टी देखने में तो बाटी जैसी लगती है, लेकिन थोड़ा सा अन्तर है. इसके अन्दर भरी जाने वाली पिठ्ठी सत्तू से बनाई जाती है और यह लिट्टी बैगन के चोखा (भुर्ता) या आलू के चोखा के साथ खाई जाती है.  मिक्स वेज चोखा भी बनाया जाता है. तो आइये बनाना शुरू करें लिट्टी चोखा|

आवश्यक सामग्री  Ingredients for Litti

  • आटा लगाने के लिये
  • गेहूं का आटा - 400 ग्राम (2 कप)
  • अजवायन - आधा छोटी चम्मच
  • घी - 2 टेबल स्पून
  • दहीं - 3/4 कप
  • खाने का सोडा - आधा छोटी चम्मच
  • नमक - 3/4 छोटी चम्मच
पिठ्ठी बनाने के लिये Ingredients for stuffing
  • सत्तू - 200 ग्राम (1 कप)
  • अदरक - 1 इंच लम्बा टुकड़ा
  • हरी मिर्च - 2-4
  • हरा धनियां - आधा कप बारीक कतरा हुआ
  • जीरा - 1 छोटी चम्मच
  • अजवायन - 1 छोटी चम्मच
  • सरसों का तेल - 1 छोटी चम्मच
  • अचार का मसाला - 1 टेबल स्पून
  • नीबू - 1 नीबू का रस (यदि आप चाहें)
  • नमक - स्वादानुसार ( आधा छोटी चम्मच)

आवश्यक सामग्री - Ingredients for Chokha

  • बड़ा बैगन - 400 ग्राम (1 या 2 बैगन)
  • टमाटर - 250 ग्राम ( 4 टमाटर मध्यम आकार के)
  • हरी मिर्च - 2-4 (बारीक कतरी हुई)
  • अदरक - 1 1/2 इंच लम्बा टुकड़ा ( बारीक कतरा हुआ)
  • हरा धनियां - 2 टेबल स्पून ( बारीक कतरा हुआ)
  • नमक - स्वादानुसार ( एक छोटी चम्मच)
  • सरसों का तेल - 1-2 छोटी चम्मच

विधि


लिट्टी के लिये आटा लगाइये
आटे को छान कर बर्तन में निकालिये, आटे में घी, खाने का सोडा, अजवायन और नमक डाल कर अच्छी तरह मिला लीजिये, दही को फैट लीजिये और दही भी डाल कर मिला लीजिये, गुनगुने पानी की सहायता से नरम आटा गूथ लीजिये.  गुथे हुये आटे को ढककर आधा घंटे के लिये ढककर रख दीजिये.  लिट्टी बनाने के लिये आटा तैयार है.
पिठ्ठी तैयार कीजिये (How to make Stuffing for Litti)
अदरक को धोइये, छीलिये और बारीक टुकड़ों में काट लीजिये (कद्दूकस भी कर सकते हैं).  हरी मिर्च के डंठल तोड़िये, धोइये और बारीक कतर लीजिये.  हरा धनियां को साफ कीजिये, धोइये बारीक कतर लीजिये. सत्तू को किसी बर्तन में निकालिये, कतरे हुये अदरक, हरी मिर्च, धनियां, नीबू का रस, नमक, जीरा,अजवायन, सरसों का तेल और अचार का मसाला मिला लीजिये, अगर पिठ्ठी सूखी लग रही है तो 1-2 चम्मच पानी डालिये, सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लीजिये, सत्तू की पिठ्ठी तैयार है.
लिट्टी (How to make Litti)
गुथे हुये आटे से मध्यम आकार की लोइयां बना लीजिये.  लोई को अंगुलियों की सहायता से 2-3 इंच के व्यास में बड़ा कर लीजिये, इस बड़ी हुई लोई पर 1 - 1 1/2 छोटी चम्मच पिठ्ठी रखिये और आटे को चारो ओर से उठा कर बन्द कीजिये,  इस गोले को हथेली से दबा कर थोड़ा चपटा कीजिये, लिट्टी सिकने के लिये तैयार है.
तंदूर को गरम कीजिये, भरी हुई लोइयों को तंदूर में रखिये और पलट पलट कर ब्राउन होने तक सेकिये.  (पारम्परिक रूप से  लिट्टी उपले पर सेकीं जाती है)
चोखा How to make Chokha for Litti
बैगन और टमाटर धोइये और भून लीजिये, ठंडा कीजिये, छिलका उतार लीजिये, किसी प्याले में रख कर चमचे से मैस कीजिये, कतरे हुये मसाले और नमक, तेल डाल कर अच्छी तरह मिलाइये. लीजिये बैगन का चोखा तैयार है.
आप लहसुन और प्याज पसन्द करते है तब 5-6 लहसन की कली छीलिये बारीक कतरिये और एक प्याज छीलिये, बारीक कतरिये इन्हैं भी इस बैगन में मिला लीजिये.
आलू का चोखा (Aloo ka Chikha)
उबले आलू 4-5 छील कर बारीक तोड़ लीजिये, कतरे हुये अदरक, हरी मिर्च, हरे धनिये, लाल मिर्च, नमक मिलाइये, आलू का चोखा तैयार है.
परोसिये
चोखा प्याले में डालिये, गरमा गरम लिट्टी को पिघले हुये घी में डुबाइये, लिट्टी को बीच से तोड़ कर भी घी में डुबाया जा सकता है,  चोखा के साथ, हरी धनिये की चटनी के साथ परोसिये और खाइये.
  • चार सदस्यों के लिये
  • समय - 1 घंटा, 30 मिनिट


Wednesday, June 15, 2011

पापड़ी चाट


सामग्री :

पापड़ी के लिए:
1-1/2 कप आटा, 3 कप मैदा, 1/4 कप तेल, 1 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर, 1/2 टी स्पून हल्दी पाउडर, 1/4 टी स्पून हींग, 1 टी स्पून जीरा, 1 टी स्पून अजवायन, 2 टे.स्पून तेल, नमक स्वादानुसार।

हरी चटनी के लिए:
50 ग्राम हरा धनिया, 1/2 कप कसा हुआ नारियल, 1 टी स्पून नींबू का रस, 1 हरी मिर्च, नमक स्वादानुसार।

लाल चटनी के लिए:
4-5 खजूर, 1 टे.स्पून इमली, 1/4 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर, नमक स्वादानुसार।

दही के लिए:
4 कप दही, 3 टे. स्पून चीनी, 2-3 करी पत्ता, 1/4 टी स्पून सरसों के दाने, 1/4 टी स्पून जीरा, नमक स्वादानुसार, 2 टी स्पून तेल।

सर्विंग के लिए:
2 आलू, बारीक कटा हरा धनिया।

विधि :
पापड़ी के लिए:
जीरा और अजवायन को पीस लें। मैदा, आटा, लाल मिर्च पाउडर, हल्दी, नमक, हींग, तेल और पिसी हुई अजवायन जीरा मिलाकर सख्त गूंध लें। छोटी-छोटी पापडि़या बनाकर गरम तेल में तल लें।

हरी चटनी:
नारियल को कद्दूकस कर लें अब इसमें हरा धनिया, नमक, नींबू का रस और हरी मिर्च डालकर बारीक पीस लें।

लाल चटनी:
खजूर और इमली को एक साथ उबालकर अच्छी तरह मैश कर लें। पानी डालकर पकाये मिक्सी में डालकर एकसार कर लें अब इसमें नमक और लाल मिर्च पाउडर डालकर अच्छी तरह मिला लें।

दही के लिए:
दही को फेंट कर उसमें चीनी और नमक मिला लें। तेल को गरम करके उसमें सरसों, जीरा और करी पत्ता डालकर चटकने दें और दही में डालकर मिला लें।

आलू को उबालकर छोटे टुकड़ों में काट लें। अब इसमें नमक और चाट मसाला मिला लें। सर्व करने के लिए एक प्लेट में पापड़ी को डालें अब ऊपर से आलू के टुकड़े डाल दें, 3 टे.स्पून दही डालकर मिला लें, 1 टी स्पून हरी चटनी और लाल चटनी भी डाल दें। ऊपर से लाल मिर्च पाउडर, चाट मसाला और बारीक कटे हरे धनिये से सजाकर सर्व करें।

कितने लोगों के लिए : 5

Rajnikanth Style Fielding

Thursday, May 26, 2011

गोलगप्पे व पानी


गोलगप्पे की सामग्री :
500 ग्राम सूजी, चुटकी भर मीठा सोडा, तेल सूजी में मिलाने व तलने के लिए।

विधि :
सबसे पहले सूजी को एक बड़ी थाली में छान लें। उसमें चुटकी भर मीठा सोडा मिलाएं। एक कड़ाही में तेल गरम करें। इस तेल को सूजी में मिलाकर आटे की तरह गूंध लें और छोटी-छोटी लोइयां बनाएं। इन लोइयों को गीले सूती कपड़े से ढक दें। करीब 15 मिनट बाद कड़ाही में रिफाइंड गरम करें। एक-एक लोई को चकले पर बेलें और पूरी की तरह कड़ाही में तलें और किसी सोफ्ट कागज पर फैला दें, लीजिए तैयार हैं, सूजी के गोलगप्पे।

पानी की सामग्री:-
2 लीटर शुद्ध पानी, 2 टी स्पून सफेद नमक, 2 टी स्पून काला नमक, 2 टी स्पून लाल मिर्च, 2 टी स्पून पीली मिर्च पाउडर, 2 टी स्पून काली मिर्च, 1 टी स्पून जीरा भुना हुआ, 2 कप इमली खटाई अथवा आधा टी स्पून सिट्रिक एसिड, 300 ग्राम चीनी, आधा कप हरा धनिया व पुदीना (पिसा हुआ), चुटकी भर हींग।

पानी के लिए:
सफेद व काला नमक, लाल, पीली व काली मिर्च व जीरा इन सभी मसालों को आधे गिलास पानी में 5 मिनट के लिए भिगो दें। बाकी बचे पानी में इमली या सीट्रिक एसिड मिलाएं। चीनी भी घोल दें। अब इसमें धनिया पुदीना पेस्ट भी मिलाएं। फिर गिलास वाला मसाले का पानी भी मिला दें। जब अच्छी तरह घुल जाए तो हींग डालें व थोड़ी सी बर्फ भी मिलाएं। ठंडा होने पर गोलगप्पे के साथ परोसें। अगर नमकीन पानी पसंद है तो चीनी न मिलाएं।

कितने लोगों के लिए : 10





Monday, May 9, 2011

उद्योगनगरी ट्रेन हादसाः तस्वीरें


मुंबई से लखनऊ जा रही उद्योनगरी एक्‍सप्रेस आज तड़के मध्‍य प्रदेश में विदिशा जिले में दुर्घटनाग्रस्‍त हो गई। ट्रेन के सात डिब्‍बे पटरी से उतर गए हैं। हादसा सुबह छह बजकर 20 मिनट पर हुआ। डीआरएम घनश्‍याम सिंह ने बताया कि यह घटना सौराई और सुमेर स्‍टेशनों के बीच हुई।

सेंट्रल रेलवे के पीआरओ ए के सक्‍सेना ने घटना की पुष्टि की है। एसपी आईपी अरजारिया के मुताबिक इस हादसे में करीब 25 लोग घायल हुए हैं जिन्‍हें उपचार के लिए विदिशा स्थित जिला अस्‍पताल में भर्ती कराया गया है। घायलों में करीब 10 लोगों की हालत गंभीर है। मेडिकल टीम मौके पर पहुंच गई है। घटना के कारणों का पता नहीं चल सका है।

उद्योनगरी एक्‍सप्रेस के हादसे से दिल्‍ली और भोपाल के बीच रेल यातायात बाधित हो गया है। कई ट्रेनों को दूसरे रूट से चलाया जा रहा है। भोपाल के हेल्‍पलाइन नंबर हैं 0755 4001583 और 0755 4001608.









Thursday, May 5, 2011

लादेन की हवेली में मारे गए 3 लोगों की तस्‍वीरें


ओसामा बिन लादेन को मारने के लिए हुए अमेरिकी ऑपरेशन में आतंकी सरगना के तीन सहयोगी भी मारे गए थे। न्‍यूज एजेंसी 'रायटर्स' ने ये तस्‍वीरें जारी की हैं।

रायटर्स का कहना है कि उसकी ओर से जारी की गई तस्‍वीरें पाकिस्‍तान के एबटाबाद स्थित लादेन के घर हुए हमले के एक घंटे बाद ली गई हैं। पाकिस्‍तान के एक सुरक्षा अधिका‍री ने ये तस्‍वीरें खीचीं और उन्‍हें रायटर्स को बेच दिया।

इन तस्‍वीरों में तीन मृत लोगों के खून से लथपथ शरीर और लादेन के अहाते में गिरा दुर्घटनाग्रस्‍त अमेरिकी हेलीकॉप्‍टर दिखाई दे रहा है लेकिन लादेन के साथियों के पास किसी तरह के हथियार नहीं दिख रहे हैं।
हालांकि अमेरिकी राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने ऐलान किया है कि अमेरिकी सैनिकों द्वारा लादेन के मृत शरीर की ली गई तस्‍वीरें सार्वजनिक तौर पर नहीं दिखाई जाएंगी। 







Wednesday, May 4, 2011

रहस्यमयी 'गाना' जिसे सुनते ही आ जाती है 'मौत' !!


रेज़सो सेरेस का जन्म 1889 में बुडापेस्ट में हुआ था। उनकी जिंदगी का ज्यादातर वक्त गरीबी में गुजरा। वे एक पियानो वादक और गीतकार थे। 1932 में वे पेरिस में बतौर गीतकार कदम जमाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। वे यहां किसी को प्रभावित नहीं कर पा रहे थे, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। इस बात पर उनकी गर्लफ्रेंड से बहस होती थी। 


वह चाहती थी कि रेज़सो कोई नौकरी कर लें। एक दिन इंतेहा हो गई और ये जोड़ी कटु शब्दों के साथ जुदा हो गई। गमगीन हो चुके रेज़सो पियनो पर बैठ गए और घंटों बीती यादों को ताजा करते रहे। फिर अचानक उन्होंने कलम थाम ली और ग्लूमी संडे गीत लिख दिया।



ये गीत दुनियाभर में प्रकाशित हुआ। फिर एकाएक इस गीत के साथ एक रहस्य जुड़ गया। एक दिन बर्लिन में एक युवक ने बैंड वालों से यह गीत बजाने को कहा। इसके बाद वह घर गया और खुद के सिर में गोली मार ली। ये गाना सुनकर वह बेहद हताश हो गया और ये सदमा दिमाग से नहीं निकाल सका। कुछ दिन बाद वहां एक लड़की फांसी पर झूलती मिली। उसके कमरे में भी ग्लूमी संडे की कॉपी थी। 

इसके दो दिन बाद एक और लड़की ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उसके अंतिम संस्कार में ये गीत बजाया जाए। एक हफ्ते बाद न्यूयॉर्क में एक 82 वर्षीय बुजुर्ग ये गीत सुनते-सुनते अचानक सातवीं मंजिल से कूद गए।



ऐसे और भी दर्जनों केस सामने आए और इस गीत के रहस्य को खबरों में भी जगह मिली। फिर भी द्वितीय विश्वयुद्ध की उधेड़-बुन में ये गीत भुला दिया गया। फिर भी इस गीत में कैसा दर्द था, जिसे कमजोर दिल वाले सहन नहीं कर पाते थे, यह राज ही बना हुआ है। 



Gloomy Sunday lyrics
Sunday is Gloomy,
My hours are slumberless,
Dearest the shadows
I live with are numberless
Little white flowers will
never awaken you
Not where the black coach
of sorrow has taken you
Angels have no thought of
ever returning you
Would they be angry
if I thought of joining you
Gloomy Sunday!

Sunday is gloomy
with shadows I spend it all
My heart and I have
decided to end it all
Soon there'll be candles
and prayers that are said,
I know, but let them not weep,
let them know
that I'm glad to go

Death is no dream,
for in death I'm caressing you
With the last breath of my
soul I'll be blessing you

Gloomy Sunday
Dreaming
I was only dreaming
I wake and I find you
asleep in the deep of
my heart dear

Darling I hope that my dream
never haunted you
My heart is telling you
how much I wanted you
Gloomy Sunday
Gloomy Sunday

Tuesday, May 3, 2011

Laden ka THE END

पुरी में समुद्र किनारे रेत पर सुदर्शन पटनायक ने ओसामा बिन लादेन का चित्र उकेरा.

Thursday, April 21, 2011

दवाई का प्रिस्क्रिप्शन

एक भद्र महिला एक फार्मेसी में गई और सीधे जाकर फार्मासिस्ट से कहा : ‘मैं सायनाइड खरीदना चाहती हूं।’ 
फार्मासिस्ट ने पूछा : ‘क्यों?’ 
उसने जवाब दिया : ‘मैं अपने पति को सायनाइड खिला देना चाहती हूं।’
फार्मासिस्ट हैरान रह गया। उसने कहा : ‘मैं आपको सायनाइड नहीं दे सकता। यह गैरकानूनी है। अगर मैंने आपको सायनाइड दिया तो मेरा लाइसेंस छिन जाएगा। पुलिस हम दोनों को जेल में कैद कर देगी। मैं बरबाद हो जाऊंगा।’
महिला चुप रही। फिर उसने अपने पर्स में हाथ डाला और उसमें से एक फोटो निकाला। फोटो में उसका पति फार्मासिस्ट की पत्नी के साथ था।
फार्मासिस्ट ने फोटो देखा और कहा : ‘आपने पहले क्यों नहीं बताया कि आप दवाई के लिए प्रिस्क्रिप्शन भी लेकर आई हैं!’

Tuesday, April 19, 2011

हनीमून मनाने निकले इस जोड़े का पीछा कर रही थी तबाही


स्वीडन के स्टॉकहोम में रहने वाले स्टीफन स्वैनस्ट्रॉम और एरिका की मुलाकात 2007 में हुई थी, तभी से दोनों साथ में रह रहे हैं। अब तके वे 16 देश घूम चुके हैं। उनकी एक बेटी भी है एलिनॉर। 27 नवंबर 2010 को उन्होंने शादी की और एक सप्ताह बाद हनीमून मनाने के लिए निकल पड़े। 

पहला स्टॉप था म्यूनिख, जहां बर्फबारी ने उनकी सिंगापुर की फ्लाइट एक दिन लेट कर दी। फिर थाईलैंड और बाली होते हुए वे ऑस्ट्रेलिया के केर्न्‍स पहुंचे। केर्न्‍स में वे बारिश और तूफान में फंस गए। इससे बचकर वे ब्रिस्बेन पहुंचे, यहां बाढ़ आ गई। बाढ़ से बचकर वे पर्थ पहुंचे तो वहां आग लग गई। अगला मुकाम था न्यूजीलैंड का क्राइस्टचर्च। यहां उनके कदम पड़ते ही भूकंप आ गया। फिर वे पहुंचे जापान। यहां वे टोक्यो में लंच कर रहे थे और भूकंप आ गया।

मौत के दरवाजे से हर बार लौटाया गया यह शख्स


क्रोएशिया के फ्राने सेलक का जन्म 1929 में हुआ था। जनवरी 1962 में वे ट्रेन से साराजीवो से डूब्रोवनिक जा रहे थे। ट्रेन पटरी से उतरकर बर्फ जमी हुई नदी में गिरी। हादसे में 17 लोग मारे गए थे लेकिन फ्राने का सिर्फ एक हाथ टूटा था। इसके अगले साल वे ज़गरेब से रिजेका की हवाई यात्रा कर रहे थे। 

अचानक प्लेन का दरवाजा उखड़ा और यात्री बाहर आ गए। यहां भी 19 लोग मारे गए थे लेकिन फ्राने भूसे के ढेर पर गिरने से बच गए। 1966 में वे बस से यात्रा कर रहे थे। बस नदी में गिरी, चार लोग मारे गए लेकिन फ्राने को खरोंच तक नहीं आई। 1970 में एक खराब पंप की वजह से उनकी कार अचानक लपटों में घिर गई लेकिन यहां भी फ्राने बच गए। 

1973 में उनकी एक और कार में आग लगी थी। इस बार भी फ्राने बच गए सिर्फ उनके बाल जले थे। 1995 में सिटी बस ने उन्हें टक्कर मारी और उन्हें मामूली सी चोटें आईं। 1996 में एक घाट पर ट्रक से बचने के लिए उन्हें कार खाई में कुदाना पड़ी थी। वे एक पेड़ पर अटक गए और कार 300 फीट नीचे खाई में गिरी। वहीं उन्हें 2003 में 10 लाख डॉलर की लॉटरी भी लगी थी। वे कहते हैं कि आप मुझे दुनिया का सबसे खुशनसीब या बदनसीब आदमी कह सकते हैं।

Thursday, April 7, 2011

चश्मे से चाहिए आजादी तो आजमाएं ये पांच नुस्खे

आजकल काम या पढ़ाई के कारण जरूरत से ज्यादा आंखों पर बोझ पड़ रहा है। पौष्टिक खाने की कमी के कारण भी अधिकाशंत लोगो की आंखें कमजोर होती जा रही हैं । 

अक्सर देखने में आता है कि छोटे-छोटे बच्चों को भी जल्दी ही मोटे नम्बर का चश्मा चढ़ जाता है। अगर आपको भी चश्मा लगा है तो आपका चश्मा उतर सकता है।

नीचे बताए नुस्खों को करीब चालीस दिनों तक प्रयोग में लाएं निश्चित ही आपकी आंखों की रोशनी भी तेज होगी।

  1. बादाम की गिरी, सौंफ बड़ी और मिश्री तीनों का पावडर बनाकर रोज एक चम्मच एक गिलास दूध के साथ रात को सोते समय लें|
  2. पैर के तलवों में सरसों का तेल मालिश करने से आखों की रोशनी तेज होती है।
  3. सुबह उठते ही मुंह में ठण्डा पानी भरकर मुंह फुलाकर आखों में छींटे मारने से आखें की रोशनी बढ़ती है।
  4. त्रिफला के पानी से आखें धोने से आखों की रोशनी तेज होती है।
  5. रोज सुबह नंगे पांव हरी घास पर घूमें|

Monday, March 28, 2011

Sachin ki century


AFRIDI- Hum Sachin ko kisi haal me century nai banane denge.
SHOAIB- Magar hum use rokenge kaise,Wo to Gajab ki form hai ??.
AFRIDI- Hum under 100 All Out ho jayenge

DID Grand Finale episode : Clip leaked


DID Grand Finale : All the finalist

पाइनएपल पंच


सामग्री :
2 कप अनन्नास का जूस, 1 कप अंगूर का जूस, 1 कप संतरे का जूस, 2 टी स्पून भुना जीरा, 4-6 टे.स्पून अजमोद (सेलरी) कटी हुई, स्वादानुसार नमक, 2-3 कप घिसी हुई बर्फ, 1/2 कप अनन्नास के टुकड़े, 1/4 कप अंगूर अलग-अलग किए हुए, 4-6 सेलरी स्टिक चलाने के लिए।

कितने लोगों के लिए : 5

विधि :
अंगूर का जूस गिलास में डालें। ऊपर से जीरा, नमक और सेलरी छिड़क दें। इसमें एक चौथाई कप घिसी हुई बर्फ डालें। फिर अनन्नास का जूस, संतरे का जूस मिलाएं। लेकिन इसे हिलाएं नहीं। सजाने के लिए ऊपर से अनन्नास के छोटे-छोटे टुकड़े और अंगूर डालें। सेलरी स्टिक गिलास में डालकर सर्व करें।

सिर्फ दो मिनट में ही उतर जाएगा बिच्छू का जहर


गर्मियों के आते ही जहरीले कीड़े मकोड़े जमीन के अन्दर से निकल कर बाहर घूमने लगते हैं। उन्हें जहां भी अपने लिए सही वातावरण मिलता है वे वहीं पर अपना ठिकाना बना लेते है। कई जहरीले कीड़े ऐसे होते है जो अगर किसी को काट लें तो उनका जहर उतारना बड़ा ही मुश्किल होता है। 



उन्हीं में से एक है बिच्छु, बिच्छु का जहर बहुत खतरनाक होता है।उसके काटने के बाद पूरे शरीर में जलन होने लगती है और उसका शिकार बुरी तरह से तड़पने लगता है। कुछ छोटे लेकिन बड़े काम के नुस्खे हैं जो आपको बिच्छु के जहर से बचा सकते हैं।



- एक पत्थर को अच्छे से साफ कर उस उस पर फिटकरी को अच्छे से घिसें। जहां पर बिच्छु ने काटा है उस जगह पर इस लेप को लगाऐं और आग से थोड़ा सेकें । कैसे भी बिच्छु का जहर हो इस विधि से जहर दो मिनिट में उतर जाएगा।



- बारीक पिसा सेंधा नमक और प्याज को मिलाकर बिच्छु के काटे हुए स्थान पर लगाने से जहर उतर जाता है। 



- माचिस की पांच सात तीलियों का मसाला पानीमें घिसकर बिच्छु के डंक लगी जगह पर लगाऐं। इसे लगाते ही बिच्छु का जहर तुरंत उतर जाता है। 



विशेष- जब किसी को बिच्छु काट ले तो तुरंत उस जगह को करी चार उंगल ऊपर से किसी कपड़े से या रस्सी से बांध देना चाहिए। ताकि उसका जहर जल्दी न फैले। इसके बाद किसी साफ सेफ्टी पिन या चिमटी को गर्म करके त्वचा में घुसे ड़ंक को निकाल देन चाहिए। 

Tuesday, March 22, 2011

कर्तव्यनिष्ठा


ईरान के शाह अब्बास को उनके एक पदाधिकारी ने अपने यहां आमंत्रित किया। निमंत्रण में पहुंचकर शाह ने इतना मद्यपान किया कि वे उन्मत्त हो उठे। नशे में झूमते हुए शाह उस पदाधिकारी के अंत:पुर के द्वार पर पहुंच गए, किंतु द्वारपाल मार्ग रोककर खड़ा हो गया। शाह को गुस्सा आ गया। उन्होंने तलवार खींच ली और कहा - हट सामने से, नहीं तो अभी तेरा सिर उड़ा दूंगा। द्वारपाल ने नम्रतापूर्वक कहा - मैं अपना कर्तव्यपालन कर रहा हूं। आप मेरे देश के स्वामी हैं, इसलिए आप पर हाथ नहीं उठा सकता, किंतु जब तक मैं जीवित हूं, आप भीतर नहीं जा सकते। मेरा वध कर दीजिए। फिर मेरी लाश पर पैर रखकर ही आप भीतर जा सकते हैं, लेकिन जहांपनाह, मैं अपने स्वामी की मर्यादा की रक्षा के साथ आपकी रक्षा के लिए खड़ा हूं। आप मुझे मारकर भीतर चले गए तो मेरे स्वामी की बेगमें हथियार उठा लेंगी। शाह अब्बास का नशा अपने प्राणों की चिंता में ठंडा पड़ गया और वे लौट गए। 

दूसरे दिन दरबार में इस पदाधिकारी ने कहा - हुजूर, मेरे द्वारपाल ने आपसे जो बेअदबी की, उसके लिए माफी चाहता हूं। मैंने उसे आज से अपने यहां से निकाल दिया है। तब शाह बोले - चलो अच्छा हुआ, अब मुझे तुमसे उस कर्तव्यनिष्ठ सेवक को मांगना नहीं पड़ेगा। मैं उसे अपने अंगरक्षक सैनिकों का सरदार बना रहा हूं। 

वस्तुत: अपने कर्तव्यों का पालन हर परिस्थिति में करना चाहिए। सच्ची कर्तव्यनिष्ठा अपनी आत्मा में ईमानदार बने रहने का उत्तम मार्ग है और सदैव परिणाम भी अच्छे देती है।

विश्व जल दिवस

आज पूरी दुनिया में ११० करोड़ लोगों की पीने के पानी तक पहुँच नहीं है, और शोध बताते है कि यदि इसी तरह से पानी का उपयोग (दुरूपयोग) होता रहा तो अगले २० वर्षो में १८० करोड़ लोगों को पानी कि समस्या से जूझना पड़ेगा|

आज २२ मार्च विश्व जल दिवस के रूप में मनाया जाता है, आज के दिन को कुछ अलग बनाये और जल संरक्षण का प्रण ले एवं अधिक से अधिक लोगों को जल संरक्षण के प्रति जागरूक करें|

जल ही जीवन है|

Monday, March 14, 2011

पोहा रोल


सामग्री :
1 अंडा, 30 ग्राम पोहा, 100 ग्राम आलू, 2 हरी मिर्च, 2 टे.स्पून हरा धनिया, 20 ग्राम भुनी मूंगफली, 1/4 टी स्पून अमचूर पाउडर, 1/4 टी स्पून गरम मसाला पाउडर, 1/4 टी स्पून लाल मिर्च पाउडर, 2 टे.स्पून ब्रेड क्रम्बस, नमक स्वादानुसार, तलने के लिए तेल।

कितने लोगों के लिए : 3

विधि :
आलू को उबालकर छील लें और ठंडा कर मैश कर लें। पोहा छन्नी में डालकर धो लें। मूंगफली को पीस लें। हरी मिर्च और हरा धनिया भी धोकर बारीक काट लें।
अब एक बाउल में पोहा, मूंगफली, हरी मिर्च, हरा धनिया और सभी मसाले डालकर अच्छी तरह मिला लें। अब इस मिश्रण से छोटे-छोटे रोल बना लें। एक बर्तन में अंडा डालकर फेंट लें। रोल को अंडे के घोल में डुबोकर ब्रेड क्रम्बस में लपेटकर गरम तेल में तल लें।
गर्मागर्म पोहा रोल अपनी मनपसंद चटनी के साथ सर्व करें।


Tuesday, March 8, 2011

भारतीय नर्क

एक आदमी मरने के बाद नर्क में पहुँचता है| वहाँ वह देखता है कि हर देश का एक अलग नर्क है|
वह जर्मनी के नर्क में पहुँचता है और पूछता है "यहाँ क्या होता है??"
जवाब मिलता है, "सबसे पहले एक घंटे के लिए तुम्हे बिजली की कुर्सी पर बैठाया जायेगा, फिर अगले एक घंटे तुम्हे कीलों के बिस्तर पर सुलाया जायेगा, फिर जर्मनी का शैतान आकर दिन भर तुम्हारी पिटाई लगाएगा|"
आदमी को ये सब पसंद नहीं आया, तो वह और देशों के नर्क भी देखने लगा, उसने सभी नरकों को लगभग एक सा ही पाया|
तभी उसकी नज़र भारतीय नर्क पर पड़ी, जहाँ अन्दर जाने के लिए लम्बी वेटिंग चल रही थी|
उसने आश्चर्यचकित होकर पूछा "यहाँ क्या होता है??"
जवाब मिलता है, "सबसे पहले एक घंटे के लिए तुम्हे बिजली की कुर्सी पर बैठाया जायेगा, फिर अगले एक घंटे तुम्हे कीलों के बिस्तर पर सुलाया जायेगा, फिर भारत का शैतान आकर दिन भर तुम्हारी पिटाई लगाएगा|"
"लेकिन ये तो सभी नरकों में होता है, फिर ये सारे लोग यहाँ लाइन लगा के क्यों इंतज़ार कर रहे है?" आदमी ने आश्चर्य से पूछा|
"घटिया रखरखाव के कारण, बिजली की कुर्सी काम नहीं करती है, बिस्तर से किसी ने सारी कीलें चुरा ली है और भारतीय शैतान भूतपूर्व सरकारी कर्मचारी है, तो वह आता है और रजिस्टर पर साइन करता है और केन्टीन चला जाता है"

Thursday, February 24, 2011

आखिरी पत्ता

आखिरी पत्ता ओ हेनरी द्वारा अंग्रेजी मे लिखी कहानी है। इस कहानी का अंग्रेजी नाम 'द लास्ट लीफ' (The last leaf) है।


वाशिंगटन चौक के पश्चिम की ओर एक छोटा-सा मुहल्ला है जिसमें टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के जाल में कई बस्तियां बसी हुई हैं। ये बस्तियां बिना किसी तरतीब के बिखरी हुई है। कहीं-कहीं सड़क अपना ही रस्ता दो-तीन बार काट जाती है। इस सड़क के सम्बन्ध में एक कलाकार के मन में अमूल्य सम्भावना पैदा हुई कि कागज, रंग और कैनवास का कोई व्यापारी यदि तकादा करने यहां आये तो रास्ते में उसकी अपने आपसे मुठभेड़ हो हो जायेगी और उसे एक पैसा भी वसूल किये बिना वापिस लौटना पड़ेगा।
इस टूटे-फ़ूटे और विचित्र,'ग्रीनविच ग्राम' नामक मुह्ल्ले में दुनिया भर के कलाकार आकर एकत्रित होने लगे। वे सब के सब उत्तर दिशा में खिड़कियां, अठारहवीं सदी के महराबें, छत के कमरे और सस्ते किरायों की तलाश में थे। बस छठी सड़क से कुछ कांसे के लोटे और टिन की तश्तरियां खरीद लाये और ग्रहस्थी बसा ली।
एक नीचे से मकान के तीसरी मंजिल पर , सू जौर जान्सी का स्टूडियो था। जान्सी, जोना का अपभ्रंश था। एक 'मेईन' से आयी थी और दूसरी 'कैलाफ़ोर्निया' से। दोनों की मुलाकात, आठवीं सड़क के एक अत्यन्त सस्ते होटल में हुई थी। दोनों की कलारूचि और खाने-पीने की पसन्द में इतनी समानता थी कि दोनों के मिले-जुले स्टूडियो का जन्म हो गया।
यह बात मई के महीने की थी। नवम्बर की सर्दियों में एक अज्ञात अजनबी ने , जिसे डाक्टर लोग 'निमोनिया' कहते हैं. मुहल्ले में डेरा डाल कर, अपनी बर्फ़ीली उंगलियों से लोगों को छेड़ना शुरू किया। पूर्वी इलाके में तो इस सत्यनाशी ने बीसियों लोगों की बलि लेकर तहलका मचा दिया था, परन्तु पश्चिम की तंग गलियों वाले जाल में उसकी चाल कुछ धीमी पड़ गयी।
मिस्टर 'निमोनिया' स्त्रियों के साथ भी कोई रिआयत नहीं करते थे। कैलीफ़ोर्निया की आंधियों से जिसका खून फ़ीका पड़ गया हो, ऎसे किसी दुबली-पतली लड़की का इस भीमकाय फ़ुंकारते दैत्य से कोई मुकाबला तो नही था, फ़िर भी उसने जान्सी पर हमला बोल दिया। वह बेचारी चुपचाप अपनी लोहे की खाट पर पड़ी रहती और शीशे की खिड़की में से सामने के ईटों के मकान की कोरी दीवार को देखा करती।
एक दिन उसका इलाज करने वाले बूढ़े डाक्टर ने, थर्मामीटर झटकते हुये, सू को बाहर के बरामदे में बुलाकर कहा,"उसके जीने की संभावना रूपये में दो आना है और, वह भी तब, यदि उसकी इच्छा-शक्ति बनी रहे। जब लोगों के मन में जीने की इच्छा ही नही रहती और वे मौत का स्वागत करने को तैयार हो जाते हैं तो उनका इलाज धन्वंतरि भी नहीं कर सकते। इस लड़की के दिमाग पर भूत सवार हो गया है कि वह अब अच्छी नहीं होगी। क्या उसके मन पर कोई बोझ है?"
सू बोली,"और तो कुछ नहीं, पर किसी रोज नेपल्स की खाड़ी का चित्र बनाने की उसकी प्रबल आकांक्षा है।"
"चित्र? हूं! मैं पूछ रहा था, कि उसके जीवन में कोई ऎसा आकर्षण भी है कि जिससे जीने की इच्छा तीव्र हो? जैसे कोई नौजवान!"
बिच्छू के डंक की-सी चुभती आवाज में सू बोली," नौजवान? पुरूष और प्रेम-छोड़ो भी-नहीं डाक्टर साहब, ऎसी कोई बात नहीं है।"
डाक्टर बोला,"सारी बुराई की जड़ यही है। डाक्टरी विद्या के अनुसार जो कुछ मुझसे मुमकिन है, उसे किये बिना नहीं छोडूंगा। पर जब कोई मरीज अपनी अर्थी के साथ चलने वालों की संख्या गिनने लगा जाता है तब दवाइयों की शाक्ति आधी रह जाती है। अगर तुम उसके जीवन में कोई आकर्षण पैदा कर सको, जिससे वहअगली सर्दियों में प्रचलित होने वाले कपड़ो के फ़ैशन के बारे में चर्चा करने लगे, तो उसके जीने की संभावना कम से कम दूनी हो जायेगी।"
डाक्टर के जाने के बाद सू अपने कमरे में गयी और उसने रो-रो कर कई रूमाल निचोड़ने काबिल कर दिये। कुछ देर बाद, चित्रकारी का सामान लेकर, वह सीटी बजाती हुई जान्सी के कमरे में पहुंची।जान्सी, चद्दर ओढ़े, चुपचाप, बिना हिले-डुले, खिड़की की ओर देखती पड़ी थी। उसे सोई हुई जान कर उसने सीटी बजाना बन्द कर दिया।
तख्ते पर कागज लगाकर वह किसी पत्रिका की कहानी के लिए, कलम स्याही से एक तस्वीर बनाने बैठी। नवोदित कलाकारों को 'कला' की मंजिल तक पहुंचने केलिए, पत्रिकाओं के लिए तस्वीरें बनानी ही पड़ती है। जैसे साहित्य की मंजिल तक पहुंचने के लिए, नवोदित लेखकों को पत्रिकाओं की कहानियां लिखनी पड़तीहै।
ज्यों ही सू, एक घुड़सवार जैसा ब्रीजस पहने, एक आंख का चश्मा लगाये, किसी इडाहो के गडरिये के चित्र की रेखाएं बनाने लगी कि उसे एक धीमी आवाज अनेक बार दुहराती-सी सुनाई दी। वह शीघ्र ही बीमार के बिस्तरे के पास गयी।
जान्सी की आंखे खुली थीं। वह खिड़की से बाहर देख रही थी और कुछ गिनती बोल रही थी। लेकिन वह उल्टा जप कर रही थी। वह बोली,"बारह" फ़िर कुछ देर बाद "ग्यारह" फ़िर "दस" और "नौ" और तब एक साथ "आठ" और "सात"।
सू ने उत्कण्ठा से, खिड़की के बाहर नजर डाली। वहां गिनने लायक क्या था। एक खुला, बंजर चौक या बीस फ़ीट दूर ईंटों के मकान की कोरी दीवार!
एक पुरानी, ऎंठी हुई, जड़े निकली हुए,. सदाबहार की बेल दीवार की आधी ऊंचाई तक चढ़ी हुई थी। शिशिर की ठंडी सांसो ने उसके शरीर की पत्तियां तोड़ ली थीं और उसकी कंकाल शाखाएं, एकदम उघाड़ी, उन टूटी-फ़ूटी ईटों से लटक रही थीं।
सू ने पूछा,"क्या है जानी?"
अत्यन्त धीमे स्वरों में जान्सी बोली,"छ:! अब वे जल्दी-जल्दी गिर रही हैं। तीन दिन पहले वहां करीब एक सौ था। उन्हें गिनते-गिनते सिर दुखने लगाता था। वह, एक और गिरी। अब बची सिर्फ़ पांच।"
"पांच क्या? जानी, पांच क्या? अपनी सू को तो बता!"
"पत्तियां। उस बेल की पत्तियां। जिस वक्त आखिरी पत्ती गिरेगी, मैं भी चली जाऊंगी। मुझे तीन दिन से इसका पता है। क्या डाक्टर ने तुम्हें नहीं बताया?"
अत्यन्त तिरस्कार के साथ सू ने शिकायत की, "ओह! इतनी बेवकूफ़ तो कहीं नही देखी। तेरे ठीक होने का इन पत्तियों से क्या सम्बन्ध है? तू उस बैल से प्यार किया करती थी-क्यों इसलिए? बदमाश! अपनी बेवकूफ़ी बन्द कर! अभी सुबह ही तो डाक्टर ने बताया था कि तेरे जल्दी से ठीक होने की संभावना-ठीक किन शब्दो में कहां था-हां, कहा था, संभावना रूपये में चौदह आना है और न्यूयार्क में, जब हम किसी टैक्सी में बैठते हैं या किसी नयी इमारत के पास से गुजरते हैं, तब भी जीने की संभावना इससे आधिक नहीं रहती। अब थोड़ा शोरबा पीने की कोशिश कर और अपनी सू को तस्वीर बनाने दे, ताकि उसे सम्पादक महोदय के हाथों बेच कर वह अपने बीमार बच्ची के लिए थोड़ी दवा-दारू और अपने खुद के पेट के लिए कुछ रोटी-पानी ला सके।"
अपनी आंखों को खिड़की के बाहर टिकाये जान्सी बोली,"तुम्हें अब मेरे लिए शराब लाने की जरूरत नहीं। वह, एक और गिरी। नहीं मुझे शोरबे की भी जरूरत नहीं। अब सिर्फ़ चार रह गयीं। अन्धेरा होने से पहिले उस आखिरी पत्ती को गिरते हुए देख लूं-बस। फ़िर मैं भी चली जाऊंगी।"
सू उस पर झुकती हुई बोली,'प्यारी जान्सी! तुझे प्रतिज्ञा करनी होगी कि तू आंखे बन्द रखेगी, और जब तक मैं काम करती हूं, खिड़की से बाहर नहीं देखेगी। कल तक ये तस्वीर पहुंचा देनी हैं। मुझे रोशनी की जरूरत है, वर्ना अभी खिड़की बन्द कर देती।"
जान्सी ने रूखाई से पूछा,"क्या तुम दूसरे कमरे में बैठकर तस्वीरें नहीं बन सकती?"
सू ने कहा,"मुझे तेरे पास ही रहना चहिये। इसके अलावा, मैं तुझे उस बेल की तरफ़ देखने देना नहीं चाहती।"
किसी गिरी हुई मूर्ति की तरह निश्चल और सफ़ेद, अपनी आखे बन्द करती हुई, जान्सी बोली,"काम खत्म होते ही मुझे बोल देना, क्योकिं मैं उस आखिरी पत्ती को गिरते हुए देखना चाहती हूं। अब अपनी हर पकड़ को ढीला छोड़ना चाहती हूं और उन बिचारी थकी हुई पत्तियों की तरह तैरती हुई नीचे-नीचे-नीचे चलीजाना चाहती हूं।"
सू ने कहा," तू सोने की कोशिश कर। मैं खान में मजदूर का माडल बनने के लिए उस बेहरमैन को बुला लाती हूं। अभी, एक मिनट में आयी। जब तक मैं नहीं लौंटूं, तू हिलना मत!"
बूढ़ा बेहरमैन उनके नीचे ही एक कमरे में रहता था। वह भी चित्रकार था। उसकी उम्र साठ साल से भी अधिक थी। उसकी दाढ़ी, मायकल एंजेलो की तस्वीर के मोजेस की दाढ़ी की तरह, किसी बदशक्ल बंदर के सिर से किसी भूत के शरीर तक लहराती मालूम पड़ती थी। बेरहमैम एक असफ़ल कलाकार था। चालीस वर्षो से वह साधना कर रहा था, लेकिन अभी तक अपनी कला के चरण भी नहीं छू सका था। वह हर तस्वीर को बनाते समय यही सोचता कि यह उसकी उत्क्रष्ट क्रति होगी, पर कभी भी वैसी बना नहीं पाता। इधर कई वर्षो से उसने व्यावसायिक या विज्ञापन-चित्र बनाने के सिवाय, यह धन्धा ही छोड़ दिया था। उन नवयुवक कलाकारों के लिए मांडल बनकर, जो किसी पेशेवर मांडल की फ़ीस नहीं चुका सकते थे, वह आजकल अपना पेट भरता था। वह जरूरत से ज्यादा शराब पी लेता और अपनी उस उत्क्रष्ट क्रति के विषय में बकवास करता जिसके सपने वह संजोता था। वैसे वह बड़ा खूंखार बूढ़ा था, जो नम्र आदमियों की जोरदार मजाक उड़ाता, और अपने को इन दोनों जवान कलाकारों का पहरेदार कुत्ता समझा करता।
सू ने बेहरमैन को अपने अंधेरे अड्डे में पड़ा पाया। उसमें से बेर की गुठलियों-सी गन्ध आ रही थी। एक कोने में वह कोरा कनवास खड़ा था, जो उसकी उत्क्रष्ट कलाक्रति की पहिली रेखा का अंकन पाने की, पच्चीस वर्षो से बाट जोह रहा था। उसने बूढ़े को बताया कि कैसे जान्सी उन पत्तों के साथ अपने पत्ते जैसे कोमल शरीर का सम्बन्ध जोड़ कर, उनके समान बह जाने की भयभीत कल्पना करती है, और सोचती है कि उसकी पकड़ संसार पर ढीली हो जायेगी।
बूढ़े बेहरमैन ने इन मूर्ख कल्पनाओं पर गुस्से से आंखे निकाल कर अपना तिरस्कार व्यक्त किया।
वह बोला,"क्या कहा? क्या अभी तक दुनिया में ऎसे मूर्ख भी हैं, जो सिर्फ़ इसलिए कि एक उखड़ी हुई बेल से पत्ते झड़ रहे हैं, अपने मरने की कल्पना कर लेते है? मैंने तो ऎसा कहीं नहीं सुना! मैं तुम्हारे जैसे बेवकूफ़ पागलों के लिए कभी माडल नहीं बन सकता। तुमने उसके दिमाग में इस बात को घुसने ही कैसे दिया? अरे, बिचारी जान्सी!"
सू ने कहा,"वह बीमारी से बहुत कमजोर हो गयी है और बुखार के कारण ही उसके दिमाग में ऎसी अजीब-अजीब कलुषित कल्पनाएं जाग उठी हैं। अच्छा; बूढ़े बेहरमैन, तुम अगर मेरे लिए माडल नहीं बनना चाहते तो मत बनो। हो तो आखिर उल्लू के पट्ठे ही!"
बेरहमैन चिल्लाया,"तू तो लड़की की लड़की ही रही! किसने कहा कि मैं माडल नहीं बनूंगा? चल, मैं तेरे साथ चलता हूं। आधे घण्टे से यही तो झींक रहा हूं कि भई चलता हूं-चलता हू! लेकिन एक बात कहूं- यह जगह जान्सी जैसी अच्छी लड़की के मरने लायक नहीं है। किसी दिन जब मै अपनी उत्क्रष्ट कलाक्रति बना लूंगा तब हम सब यहां से चल चलेंगे। समझी? हां!"
जब वे लोग ऊपर पहुंचे तो जान्सी सो रही थी। सू ने खिड़कियों के पर्दे गिरा दिये और बेहरमैन को दूसरे कमरे में ले गयी। वहां से उन्होंने भयभीत द्रष्टि से खिड़की के बाहर उस बेल की ओर देखा। फ़िर उन्होंने, बिना एक भी शब्द बोले, एक-दूसरे की ओर देखा। अपने साथ बर्फ़ लिये हुये ठंडी बरसात लगातार गिर रही थी। एक केटली को उल्टा करके उस पर नीली कमीज में बेहरमैन को बिठाया गया जिससे चट्टान पर बैठे हुये, किसी खान के मजदूर का माडल बन जाये।
एक घण्टे की नींद के बाद जब दूसरे दिन सुबह, सू की आंख खुली तो उसने देखा कि जान्सी जड़ होकर, खिड़की के हरे पर्दे की ओर आंखे फ़ाड़ कर देख रही है। सुरसुराहट के स्वर में उसने आदेश दिया,"पर्दे उठा दे, मै देखना चाहती हूं।"
विवश होकर सू को आज्ञा माननी पड़ी।
लेकिन यह क्या! रात भर वर्षा, आंधी तूफ़ान और बर्फ़ गिरने पर भी ईंटो की दीवार से लगी हुई, उस बेल में एक पत्ती थी। अपने डंठल के पास कुछ गहरी हरी, लेकिन अपने किनारों के आसपास थकावट और और झड़ने की आशंका लिए पीली-पीली, वह पत्ती जमीन से कोई बीस फ़ुट ऊंची अभी तक अपनी डाली से लटकरही थी।
जान्सी ने कहा," यही आखिरी है। मैंने सोचा था कि यह रात में जरूर ही गिर जायगी। मैनें तूफ़ान की आवाज भी सुनी। खैर, कोई बात नहीं यह आज गिर जायेगी और उसी समय मैं भी मर जाऊंगीं।"
तकिये पर अपना थका हुआ चेहरा झुका कर सू बोली,"क्या कहती है पागल! अपना नहीं तो कम से कम मेरा ख्याल कर! मैं क्या करूंगी?"
पर जान्सी ने कोई जवाब नहीं दिया। इस दुनिया की सबसे अकेली वस्तु यह 'आत्मा' है, जब वह अपनी रहस्यमयी लम्बी यात्रा पर जाने की तैयारी में होती है। ज्यों-त्यों संसार और मित्रता से बांधने वाले उसके बन्धन ढ़ीले पड़ते गये त्यों-त्यों उसकी कल्पना ने उसे अधिक जोर से जकड़ना शुरू कर दिया।
दिन बीत गया और संध्या के क्षीण प्रकाश में भी, दीवार से लगी हुई बेल से लटका हुआ वह पत्ता, उन्हें दिखाई देता रहा। पर तभी रात पड़ने के साथ-साथ, उत्तरी हवाएं फ़िर चलने लगीं और वर्षा की झड़ियां खिड़की से टकरा कर छज्जे पर बह आयीं।
रोशनी होते ही निर्दयी जान्सी ने आदेश दिया कि पर्दे उठा दिये जाये।
बेल में पत्ती अब तक मौजूद थी।
जान्सी बहुत देर तक उसी को एकटक देखती रही। उसने सू को पुकारा, जो चौके में स्टोव पर मुर्गी का शोरबा बना रही थी। जान्सी बोली,"सूडी, मैं बहुत ही खराब लड़की हूं। कुदरत की किसी शक्ति ने, उस अन्तिम पत्ती को वहीं रोक कर, मुझे यह बता दिया कि मैं कितनी दुष्ट हूं। इस तरह मरना तो पाप है। ला, मुझे थोड़ा-सा शोरबा दे और कुछ दूध में जहर मिलाकर ला दे। पर नहीं, उससे पहले मुझे जरा शीशा दे और मेरे सिरहाने कुछ तकिये लगा, ताकि मैं बैठे-बैठे तुझे खाना बनाते हुए देख सकूं।"
कोई एक घंण्टे बाद वह बोली,"सूडी, मुझे लगता है कि मैं कभी न कभी नेपल्स की खाड़ी का चित्र जरूर बनाऊंगी।"
शाम को डाक्टर साहब फ़िर आये सू, कुछ बहाना बनाकर, उनसे बाहर जाकर मिली। सू दे दुर्बल कांपते हाथ को अपने हाथों में लेकर डाक्टर साहब बोले, "अब संभावना आठ आना मानी जा सकती है। अगर परिचर्या अच्छी हुई तो तुम जीत जाओगी और अब मैं, नीचे की मंजिल पर, एक-दूसरे मरीज को देखने जा रहा हूं। क्या नाम है उसका- बेहरमैन!-शायद कोई कलाकार है-निमोनिया हो गया है। अत्यन्त दुर्बल और बुरा आदमी है और झपट जोर की लगी है। बचने की कोई संभावना नहीं। आज उसे अस्पताल भिजवां दूंगा। वहां आराम ज्यादा मिलेगा।"
दूसरे दिन डाक्टर ने सू से कहा,"जान्सी, अब खतरे से बाहर है। तुम्हारी जीत हुई। अब तो सिर्फ़ पथ्य और देखभाल की जरूरत है।"
उस दिन शाम को सू, जान्सी के पलंग के पास आकर बैठ गयी। वह नीली ऊन का एक बेकार-सा गुलबन्द, निश्चिन्त होकर बुन रही थी। उसने तकिये के उस ओर से, अपनी बांह, सू के गले में डाल दी।
सू बोली,"मेरी भोली बिल्ली, तुझसे एक बात कहनी है। आज सुबह अस्पताल में, मिस्टर बेहरमैन की निमोनिया से म्रत्यु हो गयी। वह सिर्फ़ दो रोज बीमार रहा। परसों सुबह ही चौकीदार ने उसे अपने कमरे में दर्द से तड़पता पाया था। उसके कपड़े-यहां तक कि जूते भी पूरी तरह से भीगे हुए और बर्फ के समान ठंडे हो रहे थे। कोई नहीं जानता कि ऎसी भयानक रात में वह कहां गया था। लेकिन उसके कमरे से एक जलती हुई लालटेन, एक नसैनी, दो-चार ब्रश और फ़लक पर कुछ हरा और पीला रंग मिलाया हुआ मिला। जरा खिड़की से बाहर तो देख-दीवार के पास की उस अन्तिम पत्ती को। क्या तुझे कभी आश्चर्य नहीं हुआ कि इतनी आंधी और तूफ़ान में भी वह पत्ती हिलती क्यों नहीं? प्यारी सखी, यही बेहरमैन की उत्क्रष्ट कलाक्रति थी जिस रात को अन्तिम पत्ती गिरी उसी रात उसने उसका निर्माण किया था।"

Wednesday, February 23, 2011

दो राष्ट्रपति के बीच अनोखे संयोग


अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन और जॉन एफ केनेडी, इन दोनों की ही उनके पद पर रहते हत्या कर दी गई थी। इन दोनों को ही देश की जनता अपना हीरो मानती थी, लेकिन कुछ लोग थे जो इनके विचारों से सहमत नही थे।
जब 22 नवम्बर 1963 को जॉन एफ कैनेडी की हत्या की गई तो अचानक ही अब्राहम लिंकन की हत्या के साथ इनकी तुलना की जाने लगी। और इसके बाद जो तथ्य सामने आए वो एक अनोखे संयोग की कहानी बयां करते हैं।
- लिंकन 1846 में कांग्रेस के लिए निर्वाचित हुए थे जबकि ठीक 100 साल बाद यानि 1946 को कैनेडी भी कांग्रेस के लिए निर्वाचित हुए।
- लिंकन 1860 में अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए जबकि 1960 में कैनेडी भी इसी पद पर सत्तासीन हुए।
- दोनों ही राष्ट्रपतियों की पत्नियों ने वाइट हाउस प्रवास के दौरान अपने एक बच्चे को खो दिया था।
- लिंकन को अमेरिका में नागरिक अधिकारों के लिए जाना जाता था जबकि कैनेडी ने भी नागरिक अधिकारों के लिए गंभीर प्रयास किए।
- लिंकन का एक सचिव हुआ करता था जिसका नाम कैनेडी था जबकि कैनेडी के सचिव का नाम लिंकन था।
- दोनों ही राष्ट्रपतियों की हत्या उनकी पत्निओं की मौजूदगी में की गई।
- दोनों की मौत सिर के पीछले हिस्से में गोली लगने से हुई।
- दोनों के ही हत्यारों के तीन उपनाम थे और उनके नाम में अंग्रजी के पंद्रह लेटर थे।
- लिंकन को थिएटर के अंदर गोली लगी और वो गिरते हुए बाहर आए थे जबकि कैनेडी गोली लगने के बाद गिरते हुए थिएटर के अंदर गए थे।
- दोनों के ही हत्यारों की ट्रायल पर जाने से पहले ही हत्या कर दी गई थी।
- ऐसा माना जाता है कि दोनों राष्ट्रपतियों की हत्या के पीछे एक भीषड़ षड़यंत्र था।
- दोनों राष्ट्रपतियों के उत्तराधिकारियों के सरनेम भी एक थे। लिंकन के उत्तराधिकारी का नाम एंड्रयू जॉनसन था जबकि कैनेडी का उत्तराधिकारी लिंडन जॉनसन था।