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Wednesday, November 25, 2009

संसार की सबसे धीमी-गति की गाड़ी


वाशिंगटन-काग रेल रोड विश्व भर में सबसे धीमी गति गाड़ी चलाने के लिए प्रसिद्ध है। उसके स्वामियों को इस बात पर गर्व और गौरव है कि जुलाई 1869 में जब उसका उद्घाटन हुआ था, उस समय से आज तक एक सौ चालीस वर्ष बीत जाने के दौरान न तो यह गाड़ी कभी दुर्घटनाग्रस्त हुई। न ही इस अंतराल में करोड़ों यात्रियों में से किसी को किसी प्रकार की कोई चोट या आघात पहुंचा। वाशिंगटन-काग रेल-रोड का यह दावा बिल्कुल सच है।
इस रेल का डिज़ाइन बनाने वाले सिलवैस्टर मार्श को निर्माण-कार्यो से जुनून की हद तक प्रेम था। काग रेलवे की योजना जब उसने सरकार के धनी लोगों के सामने रखी, तो सब उसकी इस मूर्खता पर हंसने लगे।
पांच हज़ार दो सौ अस्सी (5280) फुट ऊंचे वाशिंगटन पर्वत पर रेल पटरियां बिछाना, वह भी सन्1858 में कोई समझ में आने वाली बात नहीं थी। तीन महीने तक इस योजना पर सोच-विचार करने के बाद जब सिलवैस्टर मार्श ने अपने ऩक्शे, डिज़ाइन आदि न्यू हेम्सनाइर राज्य परिषद के सामने पेश किए, तो अधिकांश सदस्य इस मूर्खता पर कहकहे लगा कर हंसने लगे।
तीन मील प्रति घंटा की गति से चलने वाली यह गाड़ी मानों इंसान की चहल-क़दमी की गति से कुछ कम ही है। सबसे छोटी और सबसे धीमी गति की गाड़ी होने के बावजूद विदेशी यात्रियों को इस में एक वर्ष पहले सीट बुक कराने में भी कई बार निराशा और असफलता का मुंह देखना पड़ता है।

Monday, November 23, 2009

वनीला पुडिंग

सामग्री: 1 प्याला कच्चे नारियल का दूध, 1 प्याला क्रीम वाला दूध, 2 बड़े चम्मच खसखस, 8-10 बादाम, 1 प्याला कद्दूकस किया पपीता, 2 बड़े चम्मच चीनी, 8-10 खजूर, 1 बड़ा चम्मच चावल का आटा, आधा छोटा चम्मच वनीला एसेंस।


विधि : खसखस व बादाम 7-8 घंटे के लिए भिगोकर रखें। बादाम का छिलका हटाएं। दोनों को पीसकर 1 प्याला पानी मिलाकर छान लें। नारियल दूध व सामान्य दूध को मिलाकर आंच पर रखें। पपीता व गाजर मिलाकर पकाएं। बीच में खसखस व बादाम का दूध व खजूर भी मिला दें। नर्म होने पर चीनी मिलाकर पकाएं। अंत में चावल का आटा थोड़े से दूध में घोलकर मिला दें। 5 मिनिट पका कर उतारें। एसेंस मिलाकर ठंडा होने दें।

7 सैकेण्ड में खुलेगा गूगल पीसी

अगर आप को कम्प्यूटर के चालू होने में लगने वाला इंतजार बर्दाश्त नहीं तो आपके लिए अच्छी खबर है। गूगल जल्द ही एक ऎसा पीसी लाने जा रहा है जो चालू होने में सात सैकेण्ड या इससे भी कम समय लेगा।

पिछले सप्ताह गूगल ने ऎसे पीसी को पहली बार सार्वजनिक तौर पर प्रदर्शित किया। गूगल का कहना है कि अगले चार महीनों में इस पीसी को बाजार में उतार दिया जाएगा। माइक्रोसॉफ्ट विन्डो के पारम्परिक कम्प्यूटरों के स्थानों पर गूगल शीघ्र ही नई ई नोट बुक भी जारी करने जा रहा है जो 2010 में उपभोक्ता के लिए आ जाएगी। इसमें डाटा सुरक्षित करने के लिए हार्डवेयर उपकरणों के स्थान पर चिप का इस्तेमाल किया जाएगा।

संभलकर मोबाइलवालों, कहीं फंस न जाना..

सरकार द्वारा बिना आईएमईआई नंबर वाले चायनीज मोबाइलों पर रोक लगाने की बात आते ही शहर में गलत तरीके से इन्हें देने का काम भी चल पड़ा है। इसमें न केवल सरकार को धोखा दिया जा रहा है बल्कि मोबाइलधारकों को भी ठगा जा रहा है।

इसलिए यदि आप भी अपने मोबाइल में यह नंबर डलवाने जा रहे हैं तो सावधान हो जाएं। क्योंकि बाजार में डाले जा रहे नकली आईएमईआई नंबर से आपका मोबाइल कुछ ही दिनों में बंद हो सकता है।

30 नवंबर से बाजार में बिना आईएमईआई नंबर वाले मोबाइल हैंडसेट काम करना बंद कर देंगे। सरकार द्वारा सुरक्षा की दृष्टि से उठाए गए इस कदम के बाद इंदौर सहित देशभर में इस तरह के लाखों मोबाइल्स में फर्जी तरीके से आईएमईआई नंबर डालने का काम शुरू हो गया है। मात्र दो सौ रुपए में किया जा रहा यह काम कुछ स्थानों पर तो नियम-कानून के अनुसार किया जा रहा है लेकिन अधिकांश स्थानों पर यह गलत तरीके से हो रहा है।

दूरसंचार विभाग एक डाटाबेस तैयार करता है, जिसमें सभी कंपनियों के आईएमईआई नंबर की जानकारी होती है। इसमें एंट्री के लिए मोबाइल कंपनियों को सरकार को एक निश्चित शुल्क जमा करना होता है। लेकिन शहर में गलत तरीके से जो नंबर डाले जा रहे हैं उसका पूरा पैसे ऐसे करने वालों की जेब में जमा हो रहा है।

क्या है आईएमईआई?

आईएमईआई यानी इंटरनेशनल मोबाइल इक्यूपमेंट आइडेंटिटी। हमारे नाम और पते की तरह की मोबाइल का नाम और पता आईएमईआई के माध्यम से पता चलता है। कंपनी द्वारा बेचे गए प्रत्येक मोबाइल में यह होता है, जिसकी जानकारी सरकारी डाटाबेस में होती है।

क्या है इसमें?

आईएमईआई नंबर 15 से 17 डिजिट के बीच होता है। इससे जीएसएम और यूएमटीएस नेटवर्क पर चलने वाले प्रत्येक मोबाइल का डाटाबेस तैयार होता है। मोबाइल नेटवर्क सेवा प्रदाय करने वाली प्रत्येक कंपनी के पास आईएमईआई नंबर से चलने वाले मोबाइल का संपूर्ण रिकॉर्ड रहता है। कॉल रिकॉर्ड के साथ ही लोकेशन आदि का पता भी इससे चल जाता है।

मोबाइल बॉडी को आइडेंटिफाई करता है।

यह टीएसी (टाइप एलोकेशन कोड) को दिखाता है अर्थात् हैंडसेट का कौन-सा मॉडल है।

यह मॉडल का सीरियल नंबर बताता है।

यह लुहन अल्गोरिद्म चैक डिजिट को बताता है, जो मोबाइल के सीरियल नंबर को बताता है।

यह सॉफ्टवेयर को प्रदर्शित करता है।

कैसे पता करते हैं?

आईएमईआई नंबर जानने के लिए हैंडसेट में *#06# टाइप करना होता है। इससे मोबाइल पर उस हैंडसेट का नंबर डिस्पले होता है। अधिकांशत: यह नंबर हैंडसेट की बॉडी, बैटरी या फिर मोबाइल के पैक पर लिखा रहता है। अगर यह नंबर 15 अंकों से कम का हो तो समझ लीजिए यह नकली है।

क्यों जरूरी है?

आपका मोबाइल सेट अगर गुम या चोरी हो जाता है तो आईएमईआई नंबर के माध्यम से इसे ट्रेस किया जा सकता है। पुलिस या गुप्तचर एजेंसियों को किसी विशेष व्यक्ति और नंबर को ट्रेस करने के साथ ही उसे पकड़ने के लिए भी आईएमईआई नंबर का पता होना जरूरी होता है। मोबाइल नेटवर्क कंपनियां जरूरी होने पर आईएमईआई नंबर की कॉल आना-जाना ब्लॉक कर देती है।

आईएमईआई की जगह डाले गए फर्जी डिजिट से मोबाइल बंद भी हो सकता है

शहर में दो लाख से ज्यादा चायनीज मोबाइल है। इनमें से अधिकांश बिना आईएमईआई नंबर वाले है। इन पर आईएमईआई नंबर के स्थान पर या तो 00000 या फिर कोई नकली नंबर आता है। तीन साल पहले बिकने शुरू हुए यह मोबाइल अधिकृत मोबाइल से बहुत कम कीमत के कारण तेजी से बिके थे। इसके बाद अब भारतीय कंपनियां अपने ब्रांड के नाम से इन मोबाइल को बेच रही है लेकिन इस पर आईएमईआई नंबर आ रहे हैं।

चल रहा है गोरखधंधा

सरकार ने जब से इन नंबरों के बिना बिकने वाले मोबाइल्स को बंद करने का आदेश जारी किया है तबसे इन मोबाइल्स पर संकट खड़ा हो गया है। दूरसंचार विभाग ने इसके लिए अधिकृत सेंटर्स खोले हैं लेकिन बाजार में कुछ लोग अधिकृत नहीं होकर भी दो सौ रुपए में गलत तरीके से आईएमईआई नंबर डालने का काम कर रहे हैं।

चायना और इसी तरह के बगैर आईएमईआई नंबर वाले मोबाइल में आईएमईआई नंबर डालने के लिए मोबाइल मार्केट में तीन साफ्टवेयरों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। स्पाइडरमैन बाक्स, पीपीएफ बाक्स, आईएमईआई राइटर नाम के इन साफ्टवेयरों से आईएमईआई नंबर आसानी से डाले जा रहे हैं। वैसे इसके लिए एक हार्डवेयर की भी जरूरत होती है, जो करीब पांच हजार रुपए का आता है।

एडवांस साफ्टवेयर से डालते हैं नंबर

चायना और इसी तरह के बगैर आईएमईआई नंबर वाले मोबाइल में आईएमईआई नंबर डालने के लिए मोबाइल मार्केट में तीन साफ्टवेयरों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। स्पाइडरमैन बाक्स, पीपीएफ बाक्स, आईएमईआई राइटर नाम के इन साफ्टवेयरों से आईएमईआई नंबर डाले आसानी से डाले जा रहे हैं।

सरकार को लगा रहे हैं चूना

जो लोग गलत तरीके से यह काम कर रहे हैं, वह सीधे-सीधे सरकार को चूना लगा रहे हैं क्योंकि इसके लिए सरकार द्वारा निश्चित फीस 172 रुपए और अन्य संबंधित डाक्यूमेंट्स जमा नहीं दिए जा रहे हैं। इससे लाखों रुपए की चपत सरकार को लग चुकी है।

डाटाबेस में रजिस्ट्रेशन ही नहीं होगा

गलत तरीके से नंबर डाले गए मोबाइल थोड़े दिनों में ही बंद हो जाएंगे क्योंकि इसका रजिस्ट्रेशन सरकारी डाटाबेस में नहीं है। दुकानदार पुराने खराब हो चुके मोबाइल्स का आईएमईएम नंबर चुराकर उसमें पेस्ट कर रहे है। इससे यह मोबाइल थोड़े दिन तो चलेगा लेकिन जांच-पड़ताल होने पर बंद कर दिया जाएगा। कई-कई लोगों को एक ही नंबर कॉपी करके दे दिया गया है जबकि एक आईएमईआई नंबर का एक ही मोबाइल चल सकता है। इसलिए बाकी लोगों के मोबाइल बाद में बंद हो जाएंगे।

सिर्फ तीन जीआईआई सेंटर हैं शहर में

असली आईएमईआई नंबर सिर्फ जीआईआई साफ्टवेयर से ही डाला जाता है, इसके रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया ऑनलाइन होती है , लेकिन नकली नंबर ऑफलाइन ही डाला जाता है। मोबाइलों के आईएमईआई नंबर देने के लिए सरकार ने शहर में तीन डिस्ट्रिब्यूटरों को अधिकृत किया है जिसमें से एक तो पिछले पांच माह से अधिकृत है बाकी के दो को महीनेभर पहले ही अधिकृत किया गया है।

भविष्य में परेशानी आएगी

‘‘चायना से आने वाले मोबाइल बगैर सरकारी अनुमति के बेचे जा रहे हैं, ये नंबर किसी दूसरे हैंडसेंट्स के नंबर होते हैं। शहर के मोबाइल बाजार में नकली आईएमईआई नंबर बेचने का काम कई लोग कर रहे हैं। इस नकली नंबर से लोगों को भविष्य में काफी परेशानी होगी।

महेश जैन, ऑथोराइज्ड सेंटर प्रभारी

चीनी मोबाइल में चल रही है लोकल कारीगरी

पंद्रह मिनट की है प्रक्रिया

जिसे अपने मोबाइल का आईएमईआई राइट कराना है, उनका फोटो आईडी, और व्यक्ति का फोटो वेबकेम से लिया जाता है। इसके रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया आनलाइन होती है। इस पूरी प्रक्रिया में दस से पंद्रह मिनट लगते हैं। रजिस्ट्रेशन के लिए 199 रुपए लिए जाते हैं और इसके लिए व्यक्ति को रसीद भी दी जाती है। जबकि नकली नंबर के लिए लोगों को मोबाइल रिपेयरर के पास कुछ घंटों के लिए अपना मोबाइल छोड़ना होता है। इसी शर्त पर उसे आईएमईआई नंबर दिया जाता है।

ऐसा होना सुरक्षा के लिए खतरनाक है

‘‘आईएमईआई नंबर सिर्फ अधिकृत एजेंट के पास से ही मिल रहे हैं। इनको कहीं और से किसी साफ्टवेयर की मदद से कॉपी किए जाने के बारे में मुझे जानकारी नहीं है। यदि ऐसा हो रहा है तो यह सुरक्षा के लिए खतरा है लेकिन कोई भी टेलीकॉम आपरेटर इसके लिए क्या कर सकता है।

पीयूष खरे जीएम बीएसएनएल

कई स्थानों पर डाले जा रहे हैं नकली नंबर

‘‘शहर में कई स्थानों पर नकली आईएमईआई नंबर डालने का काम चल रहा है। यह नंबर कुछ दिनों बाद फिर से बंद हो जाएंगे। वास्तव में सरकार के पास जो ऑनलाइन डाटाबेस जा रहा है, वही अधिकृत है। लोगों को इससे बचना चाहिए।

Wednesday, November 11, 2009

मिलिए दुनिया की सबसे छोटी मम्मी से


लंदन। कहते हैं कि जहां चाह है वहां राह है। अमेरिका की इस महिला को देखकर तो ऐसा ही लगता है। अगर आपके मन में चाहत और उमंग है तो दुनिया का कोई भी काम असंभव नहीं है। केंटुकी के ड्राई रिज में रहने वाली विश्व की सबसे छोटी मम्मी तीसरी बार मां बनने जा रही हैं।

दो फीट चार इंच लंबी स्टेसी हेराल्ड को डाक्टरों ने चेतावनी दी है कि इस बार उनके मां बनने में खतरा है। इसके बावजूद उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आई है। उनकी पहले से ही दो बेटियां हैं और वह अपने तीसरे बच्चे का बेसब्री से इंतजार कर रही हैं।

सौभाग्यवश तीसरा बच्चा एक बेटा है वह इसे किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहतीं। 35 वर्षीय स्टेसी को ओस्टियोजेनेसिस इंपरफैक्टा नाम की बीमारी है। इस बीमारी में हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और फेफड़े अविकसित रह जाते हैं जिससे शरीर की वृद्धि रुक जाती है।

आश्चर्य की बात यह है कि इनके पति की लंबाई पांच फीट नौ इंच है। गर्भवती होने की वजह से स्टेसी की लंबाई और मोटाई लगभग बराबर हो गई है। इस कारण वह अपने बच्चों को गोद में भी नहीं उठा पा रही हैं। इन दोनों की पहली मुलाकात 2000 में हुई थी और 2004 में इन्होंने शादी रचा ली। उसके बाद पता चला कि स्टेसी कभी मां नहीं बन सकती। यह सुनते ही वह बुरी तरह से टूट गई। लेकिन फिर शादी के आठ महीने बाद अचानक उसे पता चला कि वह गर्भवती है तो खुशी के मारे उनका ठिकाना नहीं रहा।

डाक्टरों और परिवार वालों के मना करने के बावजूद उसने अपने पहली बेटी केटरी को जन्म दिया। लेकिन दुख की बात यह थी कि केटरी में भी उनकी मां के ही लक्षण मिले।

पाक की छवि सुधारने निकला फ्रांसिसी

इस्लामाबाद। पाकिस्तान की छवि एक अस्थिर देश की बन चुकी है। एक ऐसा देश जो अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद को खाद-पानी देने में अहम भूमिका निभा रहा है। यह अलग बात है कि उसी आतंकवाद से वह खुद भी लहूलुहान हो रहा है।

हालांकि फ्रांस के एक डाक्टर का मानना है कि पाकिस्तान वैसा नहीं है, जैसा दुनिया सोचती है। इसलिए विंसेंट लूज नाम के इस डाक्टर ने पाकिस्तान की छवि सुधारने का बीड़ा उठाया है। वह भी अनूठे तरीके से। इसके लिए वह इस्लामाबाद से लेकर फ्रांस की राजधानी पेरिस तक का सफर कार से ही तय करेंगे और रास्ते में लोगों से पाकिस्तान के बारे में बात करते चलेंगे। इस दौरान वह छह हजार मील की यात्रा करेंगे।

उन्होंने पिछले हफ्ते इस्लामाबाद से अपनी यात्रा शुरू की है। पाकिस्तान में इन दिनों तालिबानी हमलों के चलते चारों ओर दहशत का माहौल है। लेकिन इन सबसे बेखबर लूज अपनी कार वाक्सवेगन बीटल में बैठकर इस्लामाबाद की गलियां छान रहे हैं। इस बीटल पर पाकिस्तान के करीब 500 लोग सवारी कर चुके हैं। उन्होंने अपनी कार को गहरे चटकीले रंगों से पेन्ट करवाया है। उनकी कार पर मुहम्मद जिन्ना और बेनजीर भुट्टो समेत कई पाकिस्तानी नेताओं की तस्वीरें बनी हैं।

लूज अपनी यात्रा में जिस बीटल कार का इस्तेमाल कर रहे हैं, वह इस्लामाबाद के कबाड़खाने में पड़ी धूल खा रही थी। लूज ने न सिर्फ उस कार को खरीदा बल्कि उसे इस लायक भी बनाया कि वह सरहदों के पार जा सके। अब उनकी कार पाकिस्तान से लेकर फ्रांस तक में छाई हुई है।

डाक्टर साहब अगले दो हफ्तों में पेरिस पहुंच जाएंगे। इस बीटल कार को सेना ने 1950 में खरीदा था। 1970 में पाकिस्तान के वित्त मंत्री मुबासिर हसन ने लाहौर में इस कार की सवारी की थी।

Tuesday, November 10, 2009

चरनदास चोर से क्यों डरती है छत्तीसगढ़ सरकार

दोस्तों यह परिचर्चा जागरण.कॉम से ली गई है| इसके लेखक प्रणय श्रीवास्तव जी है|

छत्तीसगढ सरकार ने अपनी छवि के अनुकूल ही आचरण करते हुए 1974 से खेले जा रहे हबीब तनवीर के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त नाटक चरणदास चोर पर शनिवार 8 जुलाई से प्रतिबंध लगा दिया। मूलत: राजस्थानी लोककथा पर आधारित यह नाटक विजयदान देथा ने लिखा था जिसका नाम था फितरती चोर।

हबीब साहब ने इसे छत्तीसगढी भाषा, संस्कृति, लोक नाट्य और संगीत परंपरा में ढालने के क्रम में मूल नाटक की पटकथा और अदायगी में काफी परिवर्तन किए। चरनदास चोर अनेक दृष्टियों से एक समकालीन क्लासिक है। एक अदना सा चोर गुरु को दिए चार वचन-कि सोने की थाली में वह खाना नहीं खाएगा, कि अपने सम्मान में हाथी पर बैठ कर जुलूस में नहीं निकलेगा, राजा नहीं बनेगा और किसी राजकुमारी से विवाह नहीं करेगा के अलावा गुरु द्वारा दिलाई गई एक और कसम कि वह कभी झूठ नहीं बोलेगा, का पालन अंत तक करता है और इन्हीं वचनों को निभाने में उसकी जान चली जाती है।

चरनदास को कानून और व्यवस्था को चकमा देने की सारी हिकमतें आती हैं। वह बडे लोगों को चोरी का शिकार बनाता है। नाटक में चरनदास के माध्यम से सत्ता-व्यवस्था, प्रभुवर्गो और समाज के शासकवर्गीय दोहरे मानदंडों का खेल-खेल में मजे का भंडाफोड किया गया है। एक चोर व्यवस्था के मुकाबले ज्यादा इंसाफपसंद, ईमानदार और सच्चा निकलता है। जाहिर है कि यह नाटक लोककथा पर आधारित है, छत्तीसगढ में चल रहे संघर्षो पर नहीं। फिर सत्ता को इस नाटक से कैसा खतरा महसूस होने लगा?

यह नाटक तो 1974 में पहली बार खेला गया जब छत्तीसगढ राज्य के गठन तक की संभावना दूर दूर तक नहीं दिखती थीं। छत्तीसगढ के आज के तुमुल-संघर्षो की आहटें भी नहीं थीं। नाटक न जाने कितनी भाषाओं में अनुवाद कर खेला गया, देश और विदेश में खेला गया। 1975 में श्याम बेनेगल ने इस पर फिल्म भी बनाई। दरअसल क्लासिक की खासियत यही है कि वह अपने ऊपरी कथ्य से कहीं ज्यादा बडा अर्थ संप्रेषित करती है। अपने ऊपरी कथ्य, पात्र, देश-काल को लांघ कर बिल्कुल भिन्न युग-परिवेश में प्रासंगिक हो उठती है। क्यों महाभारत के तमाम द्वंद्व अलग अलग युग-परिवेश में बारंबार प्रासंगिक हो उठते हैं? फिर चरनदास चोर तो हबीब साहब के हाथों पूरी तरह छत्तीसगढी लोक संस्कृति में ही ढल गया। कहीं यह नाटक छत्तीसगढ राज्य बनने के बाद से से ही उस राजसत्ता के चरित्र को तो ध्वनित नहीं कर रहा, जो उस प्रदेश के सारे ही प्राकृतिक संसाधनों के कॉरपोरेट लुटेरों के पक्ष में आदिवासी जनता के खिलाफ युद्ध छेडे हुए है? कहीं यह नाटक दर्शकों और पाठकों के अवचेतन में दबे व्यवस्था विरोधी मूल्यों और आकांक्षाओं को वाणी तो नहीं दे रहा? कहीं यह नाटक अपनी क्लासिकीयता के चलते एक बिल्कुल अप्रत्याशित तरीके से आज के छत्तीसगढ की सता और लोक के बीच जारी संग्राम की व्यंजना तो नहीं कर करने लगा? यह सारे ही सवाल इस प्रतिबंध के साथ उठने स्वाभाविक हैं।

वे लोग भोले हैं जो छत्तीसगढ सरकार की इस दलील को मान बैठे हैं कि सतनामी गुरु बालदास की आपत्तियों के मद्देनजर यह प्रतिबंध लगाया गया। बालदास जी की आपत्तियां अगर कुछ महत्व रखती हैं, तो उन पर नया थियेटर के साथियों से बातचीत भी की जा सकती थी और आपत्तियों को दूर किया जा सकता था।

संस्कृतिकर्मियों और सतनामी धर्मगुरुओं की पंचायत भी बैठ सकती थी, हल निकल सकता था। लेकिन सरकार की मंशा कुछ और थी। याद आता है कि किस तरह दलित अकादमी नामक एक संस्था ने कुछ साल पहले प्रेमचंद की रंगभूमि की प्रतियां जलाई थीं। बाद में बहुतेरे दलित लेखकों ने इसकी निंदा करते हुए इस बात का पर्दाफाश किया कि यह सब संघ संप्रदाय द्वारा प्रायोजित था। धार्मिक और जातिगत अस्मिताओं का दमन और विद्वेष के लिए इस्तेमाल संघ-भाजपा की जानी-पहचानी रणनीति है। खुद सरकार और बालदास के बयानों पर ध्यान दिया जाए तो सतनामी संप्रदाय ने इस नाटक पर 2004 से पहले कोई आपत्ति दर्ज नहीं कराई थी, जबकि नाटक 1974 से खेला जा रहा था और बहुधा इसके अभिनेता भी सतनामी संप्रदाय से आते थे।

छत्तीसगढ सरकार जबरदस्त तरीके से दुरंगी चालें खेल रही है। एक ओर तो प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान के जरिए मुख्यमंत्री और संस्कृतिमंत्री के साथ तमाम जनवादी और प्रगतिशील संस्कृतिकर्मियों को बैठाया और दूसरी ओर महीना खत्म होते न होते चरनदास चोर को प्रतिबंधित कर दिया। जाहिर है कि बालदास जी की चिट्ठी प्रमोद वर्मा स्मृति सम्मान से पहले की घटना है और प्रतिबंध का मन भी सरकार इस सम्मान समारोह से पहले ही बना चुकी थी। सम्मान समारोह का तात्कालिक उपयोग यह हुआ कि जिन हलकों से प्रतिबंध के विरोध की आवाज उठ सकती थी उन्हें इस आयोजन के जरिए डिफेंसिव पर डाल दिया गया। उन्हें सरकार ने इस स्थिति में ला छोडा है कि वे अगर इसका विरोध करें भी तो उस विरोध की कोई विश्वसनीयता लोगों की निगाह में न रह जाए।

हबीब साहब के नाटकों पर संघ-भाजपा का हमला कोई नया नहीं है। अपने जीते जी उन्होंने इसका बहादुरी से सामना किया था। महावीर अग्रवाल को दिए एक साक्षात्कार में हबीब साहब ने कहा, नया थियेटर की दूसरी चुनौतियों में प्रमुख है, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के खिलाफ कलात्मक संग्राम। आप जानते हैं, फासिज्म का ही दूसरा नाम है सांस्कृतिक राष्ट्रवाद।

नए छत्तीसगढ राज्य में 29 जून 2003 से 22 जुलाई 2003 तक पोंगवा पंडित और जिन लहौर नई देख्या वो जन्मई नई के 25 मंचन हुए। नाटक का केवल विरोध ही नहीं हुआ, वरन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सोची-समझी रणनीति के तहत हमले किए गए हैं. संस्कृति के क्षेत्र में अपनी लाठी का प्रयोग संघ परिवार समय समय पर करता रहा है। हमले की शुरुआत 16 अगस्त 2003 को ग्वालियर में हुई। फिर 18 अगस्त को होशंगाबाद में, 19 अगस्त को सिवनी में, 20 अगस्त को बालाघाट और 21 अगस्त को मंदला सहित अलग अलग शहरों में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और आर.एस.एस. के लोग उपद्रव करते रहे। 24 अगस्त 2003 को भोपाल के संस्कृतिकर्मियों ने भाजपा प्रदेश कार्यालय के ठीक सामने पोंगवा पंडित पर संवाद करने की कोशिश की। वहां हमारे पोस्टर्स, बैनर छीनकर आग के हवाले कर दिए गए। गाली गलौज के साथ ईंट-पत्थर फेंकने का काम फासीवादी ताकतों ने किया। मैनें उन्हें बारंबार समझाने की कोशिश की कि पोंगवा पंडित कोई नया नाटक नहीं है। नाटक बहुत पुराना है और पिछले 70-75 वर्षो से लगातार खेला जा रहा है। 1930 के आसपास छत्तीसगढ के दो ग्रामीण अभिनेताओं ने इसे सबसे पहले जमादारिन के नाम से प्रस्तुत किया था. [सापेक्ष-47, पृष्ठ 38-39]।

क्या पता था हबीब साहब को कि उनकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद कोई अपनों में से ही गोरखपुर जाकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के कसीदे पढ आएगा। छायानट पत्रिका, अप्रैल, 2003 के अंक 102 में मोनिका तनवीर ने महावीर अग्रवाल को दिए इंटरव्यू में कहा, 1970 में इंद्रलोक सभा नाटक हमने तैयार किया तो जनसंघ के कुछ गुंडों ने हबीब पर हमला किया और एक मुसलमान की पत्‍‌नी होने के कारण मुझे भी बहुत धमकाया गया। 26 सितम्बर, 2004 को दि हिंदू को दिए एक इंटरव्यू में हबीब साहब ने एक और वाकया बयान किया है। कहा, महज दो हफ्ते पहले हरिभूमि नामक रायपुर के एक दैनिक ने पूरे दो पन्ने बहादुर कलारिन पर निकाले और मेरे खिलाफ तमाम तरह के आरोप लगाए। यह नाटक ईडिपल समस्या पर आधारित एक लोक नाट्य है। हजारों छत्तीसगढी नर-नारियों ने इसे दत्तचित्त होकर देखा, जबकि मुझे आशंका थी कि वे अगम्यागमन [इंसेस्ट] की थीम को ठीक समझेंगे कि नहीं, लेकिन भाजपा के दो सांसदों ने आपत्ति की कि मैनें यह थीम क्यों उठाई। मैनें कहा कि ईडिपल काम्पलेक्स हमारे लोक ज्ञान का हिस्सा है। वे बोले कि यदि ऐसा है भी, तो पूरी दुनिया में इसका ढिंढोरा पीटने की क्या जरूरत है? इस बात का मेरे पास कोई जवाब नहीं था। दरअसल चरनदास चोर पर प्रतिबंध को भाजपा सरकारों की सांस्कृतिक राष्ट्रवादी मुहिम का ही हिस्सा समझा जाना चाहिए, बहाना चाहे जो लिया गया हो। किसी भी लोकतंत्र में से फर्जी आधारों पर अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

मैं व्यक्तिगत तौर पर और अपने संगठन जन संस्कृति मंच की ओर से सभी जनपक्षधर ताकतों से अपील करूंगा कि चरनदास चोर पर प्रतिबंध पर चौतरफा विरोध दर्ज कराएं।

-[प्रणय श्रीवास्तव]

[महासचिव, जन संस्कृति मंच]

थोड़ा और मिल जाता तो..

दोस्तों यह कहानी दैनिक भास्कर (०८-११-२००९) से ली गई है|

यह पश्चिम के किसी देश की बात है, जहां रोटियों की जगह आमतौर पर ब्रैड खाई जाती है। वहां एक व्यक्ति रोज रेस्तरां जाता और ब्रैड के साथ सूप का ऑर्डर देता। रेस्तरां का मेनु तय था। वे लोग एक कटोरी सूप के साथ ब्रैड की चार स्लाइस देते थे। एक दिन मैनेजर ग्राहकों से रेस्तरां की सेवाओं के बारे में राय ले रहा था। उसने उस व्यक्ति से पूछा, ‘भाई साहब, आपका भोजन कैसा रहा?’ उस व्यक्ति ने जवाब दिया, ‘अच्छा तो था, पर आपको ब्रैड की कुछ ज्यादा स्लाइस देनी चाहिए।’ मैनेजर ने वेटर से अगले दिन से उसे चार की जगह छह स्लाइस देने के लिए कह दिया।

दूसरे दिन मैनेजर ने फिर अपना सवाल दोहराया, ‘सर, आज आपका खाना कैसा रहा?’ आदमी का जवाब भी वही रहा, ‘अच्छा ही था, पर आपको कुछ ज्यादा स्लाइस देनी चाहिए।’ तो मैनेजर ने अगली बार से उसे ब्रैड की आठ स्लाइस देने को कह दिया। अगले दिन मैनेजर ने ख़ुशी-ख़ुशी पूछा, ‘सर, आज का आपका भोजन कैसा रहा?’ जवाब वैसा ही ठंडा था, ‘हम्म्म..अच्छा था। लेकिन आपको कुछ ज्यादा स्लाइस देनी चाहिए।’



अब तो यह रेस्तरां की प्रतिष्ठा का सवाल बन चुका था। मैनेजर ने कहा, कुछ भी हो जाए, उस ग्राहक के मुंह से संतुष्टि के शब्द निकलवाने ही हैं। तो उसने स्टाफ़ को आदेश दिया कि उसे ब्रैड का पूरा का पूरा लोफ़ परोसा जाए, जो अमूमन दो आदमियों के लिए पर्याप्त होता है। अगले दिन उस आदमी को पूरी 16 स्लाइस परोसी गईं। लेकिन उसकी प्रतिक्रिया वही रही, ‘अच्छा..पर कुछ और स्लाइस परोसनी चाहिएं।’ यह सुनकर मैनेजर ने अपना सिर धुन लिया। पर उसने हार नहीं मानी।



वह ताव-ताव में बेकरी पहुंच गया और उसने एक छह फुट लंबी और उतनी ही चौड़ी ब्रैड बनाने का ऑर्डर दिया। अगले दिन जब यह विशालकाय ब्रैड रेस्तरां पहुंचाई गई, तो मैनेजर ने उसे चार टुकड़ों में कटवाया और बेसब्री से अपने स्पैशल ग्राहक की प्रतीक्षा करने लगा। वह व्यक्ति अपने रोजाना के समय पर पहुंच गया।



मैनेजर ने ख़ुद उसे विशाल ब्रैड के चारों टुकड़े और ढेर सारा सूप परोसा। आदमी ने कुछ खाया और बाक़ी छोड़ दिया। मैनेजर को पूरी उम्मीद थी कि आज तो वह तृप्त हो गया होगा। उसने बड़े सलीके से पूछा, ‘सर, आज आपका भोजन कैसा रहा?’ पूरे स्टाफ़ के कान उसकी ओर लगे थे। उस आदमी ने कहा, ‘अच्छा तो था, पर मैं देख रहा हूं कि आप फिर से ब्रैड की चार ही स्लाइस देने लगे।’



सबक जिंदगी का :

इंसान कभी संतुष्ट नहीं हो सकता। क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती।

मंचूरियन बॉल्स


क्या चाहिए मंचूरियन बॉल्स के लिए :
1 कटोरी पत्ता गोभी, 2 कटोरी शिमला मिर्च, 2 कटोरी बीन्स, 1 प्याज, 2 बड़े चम्मच अदरक व लहसुन का पेस्ट, 4 छोटे चम्मच मैदा, 2 बड़े चम्मच कॉर्नफ्लार, 1 बड़ा चम्मच सोया सॉस, 1 बड़ा चम्मच टमाटर सॉस, 1 छोटा चम्मच सिरका, 1 छोटा चम्मच चिली सॉस और स्वादानुसार नमक।
ग्रेवी के लिए
3 छोटे चम्मच कॉर्नफ्लार (पानी में मिलाकर घोल तैयार करें) 2 बड़े लंबे कटे हुए प्याज, 2 कप बारी कटी हुई पत्ता गोभी, 2 चम्मच लहसुन व अदरक का पेस्ट, 2 बड़े चम्मच सोया सॉस, 1 बड़ा चम्मच टमाटर सॉस, 1 छोटा चम्मच सिरका, 1 चम्मच चिली सॉस और स्वादानुसार नमक।
ऐसे बनाएं
मंचूरियन बॉल्स के लिए सभी सामग्री मिलाकर गोल बॉल्स बना लें और इन्हें मध्यम आंच पर तेल में सुनहरा होने तक तल लें।अब ग्रेवी बनाने के लिए थोड़े-से तेल में गुलाबी होने तक प्याज भून लें। साथ ही पत्ता गोभी भी डाल दें।

अब आवश्यकतानुसार कॉर्नफ्लार का घोल डालें। अब इसमें अदरक व लहसुन का पेस्ट, सोया सॉस, चिली सॉस, टमाटर सॉस, सिरका और नमक डालें और पकाएं। उबाल आने पर इसमें मंचूरियन बॉल्स डालें और गर्मा-गर्म सर्व करें।

बचपन के मुआशक़े


दोस्तों यह स्व हबीब तनवीर साहब के शब्द है, जो की दैनिक भास्कर (२८-१०-२००९) में प्रकाशित हुए थे|

इश्क़ सादिक का दौरा इससे पहले भी मुझ पर पड़ चुका था। हमारे घर में एक तोता था, पिंजरें में चारों ओर चलता रहता और मज़े-मज़े की बातें करता। एक दिन मैंने देखा कि पिंजरा गायब, तोता गायब। अम्मा से, आपा से पूछा, दोनों अनजान।


मैंने बच्चों का आज़मूदा हरबा इस्तेमाल किया, यानी रोना शुरू कर दिया, फिर कोई असर नहीं, उल्टा अम्मा और आपा हंसने लगीं, मैं गुस्से में ओल-फोल बकने लगा। ख़ैर वह दिन टल गया, कई ह़फ्ते निकल गए, मैं बात को तकरीबन भूल-सा गया था। फिर एक दिन घर के एक कोने में पड़ा मुझे उस तोते का एक पर मिल गया, बस फिर रोना शुरू। आपा जान ने कहा, दोपहर में हमलोग लेट गए थे, एक बिल्ली आई और न जाने कैसे पिंजरा खोलकर तोता लेकर चली गई।

मैंने और भी ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। फिर यह दिन बीत गया। महीने दो महीने के बाद मैं दही लाने घर से भेजा गया था। मैं अभी हलवाई वाली लाइन की तरफ़ जा ही रहा था कि आवाज़ आई, बाबा कहां जा रहे हो? मैंने हैरत से चारों तरफ़ देखा, मुझे वही पिंजरा एक दुकान में लटका नज़र आया और उसके अंदर अपना तोता। मैं पास गया तो मुझसे और भी बहुत-सी बातें करने लगा, कहा, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ अम्मा ने उसे सिखा दिया था।

मैं दुकानदार से मुखातिब हुआ। मैं सोच रहा था कि तोते की ज़ात ख़्वाहमख़्वाह बदनाम है, मैंने जो अम्मा के मुंह से तोतों पर तोता चश्मी का इल्ज़ाम बारहा सुना था, मुझे वह बिल्कुल ग़लत नज़र आया। मैंने सोचा कम से कम एक मेरा तोता तो वफ़ादार है। मैंने बनिए से कहा- यह तोता हमारा है। बनिए ने कहा यह तुम कैसे कह सकते हो। मैंने कहा देखते नहीं तोता मुसलमान है। इस दौरान तोता कुछ बड़बड़ाता रहा, मैंने गौर से सुना तो सीता राम, सीता राम की रट लगा रहा था यानी तोता सेकुयूलर था। बनिए ने कहा यह तोता हमने अच्छी रक़म देकर खरीदा है। मैंने कहा- कब ख़रीदा, किस से ख़रीदा? बनिए ने कहा अभी दो महीने पहले ख़रीदा। बेचने वाले का नाम भी बताया, रमज़ान।

मैं चुपचाप घर आ गया। घर आकर अम्मा पर बरस पड़ा। तुमने तोते को बेच दिया, आपा जान झूठ बोल रही थी। अम्मा ने कहा हमने तोता हरगिज़ नहीं बेचा। आपा जान कहने लगीं, ‘अम्मा के आराम के व़क्त दोपहर को ऐसी कऱख्त आवाज़ से चीखता रहता था कि अम्मा की नींद हराम हो जाती थी। एक दिन रमज़ान इधर आया तो अम्मा ने उससे कहा कि इस तोते को तुम ले जाओ, आपा जान क़समें खाने लगीं कि तोते को बेचा हरगिज़-हरगिज़ नहीं है।’ मैं फिर रो पड़ा।

- हबीब तनवीर

एक काली भैंस = दो नैनो कार


गुजरात के सीमावर्ती कच्छ जिले के बन्नी क्षेत्र में आयोजित पशुमेले में आई इस भैंस की कीमत में दो नैनो कार खरीदी जा सकती हैं। यह अलग बात है कि २.११ लाख की बोली के बावजूद भैंस के मालिक ने इसे बेचने से इनकार कर दिया।

Saturday, November 7, 2009

निशाना

दोस्तों यह कहानी दैनिक भास्कर (२०-०९-२००९) से ली गई है|

कंपनी ने सोचा कि सैन्य प्रशिक्षण से उसके कर्मचारियों के फोकस, समस्या सुलझाने की क्षमता और अनुशासन में बढ़ोतरी होगी। सो, उसने वरिष्ठ तकनीकी सहायता स्टाफ को सैन्य अकादमी में भेजा। वहां सबसे पहले उन्हें राइफल रेंज में ले जाया गया और राइफल, गोली, लक्ष्य आदि के बारे में जानकारी दी गई। उन्हें लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने और धड़कनों को काबू में रखकर घोड़ा दबाने के बारे में बताया गया। फिर उन्हें राइफल और कुछ गोलियां देकर टारगेट पर निशाना लगाने के लिए कहा गया।

उन कर्मचारियों ने पोजीशन ली और गोलियां चलाना शुरू कर दिया। धांय-धांय..धांय। निशानेबाजी का पहला दौर समाप्त होने पर यह देखा गया कि किस कर्मचारी की कितनी गोलियां निशाने पर लगीं। टारगेट की ओर खड़े सैनिकों ने हर टारगेट को जांचा। उन्होंने देखा कि एक कर्मचारी का कोई भी निशाना सही नहीं लगा था। उसे दुबारा निशाना लगाने के बारे में समझाया गया और फिर से कुछ गोलियां दी गईं। कर्मचारी ने राइफल संभाली और अपनी पोजीशन ले ली। उसने सोचा कि हो सकता है राइफल में ही कुछ गड़बड़ हो। सो, उसने पहले राइफल को ही अच्छी तरह जांचने का फ़ैसला किया। उसने नली में से देखा, तो टारगेट नज़र आ रहा था। इसके बाद उसने उसमें गोली भरी और ज़मीन की तरफ़ नली करके घोड़ा दबा दिया। धांय की आवा हुई, कुछ धूल उड़ी और ज़मीन पर छोटा-सा गड्ढा बन गया। वह खों-खों करने लगा।ज़मीन से उठती धूल और उसे खांसता देखकर लोग उसकी तरफ़ दौड़े। उन्होंने देखा कि वह तो हंस रहा था। एक सैन्य अधिकारी ने उससे कड़ककर पूछा कि क्या हुआ? वह हंसते हुए बोला, ‘यह तो काम कर रही है। आप लोग बेकार में ही मुझे दोषी ठहरा रहे थे।’ किसी को कुछ समझ में न आया। वह कर्मचारी टारगेट वाले सिरे की ओर इशारा करते हुए चिल्लाया, ‘मेरी राइफल बिल्कुल सही ढंग से काम कर रही है। ट्रिगर दबाने पर गोली भी बराबर छूट रही है। इसका मतलब है कि दिक्क़त तो टारगेट वाले सिरे की ओर है। फिर निशाना सही नहीं लग पा रहा है, तो मेरी क्या ग़लती?’

भयंकर ठंड पड़ेगी

दोस्तों यह कहानी दैनिक भास्कर (१३-०९-२००९) से ली गई है|

एक बार गांववालों ने अपने मुखिया से पूछा कि इस बार ठंड कैसी पड़ेगी, ताकि वे उस हिसाब से अलाव जलाने के लिए लकड़ियां इकट्ठा करके रख लें। लेकिन मुखिया नया था। वह नई पीढ़ी का था, शहर में पढ़कर आया था, इसलिए उसे मौसम का अनुमान लगाने के पारंपरिक तरीक़े नहीं पता था। बावजूद इसके वह मुखिया था, इसलिए उसे अपना अज्ञान जाहिर करने में बड़ी शर्म आई। सो, उसने बीचका रास्ता निकाते हुए कह दिया कि इस बार ठंड पड़ेगी।
मुखिया की बात मानकर गांववालों ने लकड़ी जुटाना शुरू कर दिया। इधर मुखिया ने गोलमोल जवाब तो दे दिया था, पर वह अपने लोगों को सही जानकारी भी देना चाहता था। तो उसने पास के शहर में स्थित मौसम विभाग से संपर्क किया। मुखिया ने पूछा कि इस बार ठंड के बारे में क्या अनुमान है, तो मौसम विभाग के क्लर्क ने बताया कि इस दफ़ा अच्छी ठंड पड़ने की संभावना है।
मुखिया ने अपने गांव वालों को यही बात बता दी। अब वे और तेज़ी से लकड़ियां इकट्ठा करने लगे। कुछ दिनों बाद मुखिया ने मौसम के पूर्वानुमान की और पुष्टि कर लेनी चाही। उसने फिर से शहर जाकर मौसम विभाग से पूछा। विभाग ने उसे बताया कि इस बार बड़ा तेज़ जाड़ा पड़ने वाला है।
मुखिया ने जब अपने समुदाय वालों को बताया, तो उसकी बात पर भरोसा कर वे रात-दिन लकड़ियां इकट्ठा करने में जुट गए। वे कोई और काम न करते, बस लकड़ियां जमा करते रहते।
जाड़े का मौसम अब क़रीब था। ज्यादा ठंड पड़ने के कोई लक्षण थे। तो मुखिया ने एक बार फिर मौसम विभाग से जानना चाहा। इस बार उसे जवाब मिला कि अबके तो बड़ी भयंकर ठंड पड़ने वाली है।
इस पूर्वानुमान से हैरान मुखिया ने पूछा कि आख़िर आप इतने भरोसे से कैसे कह सकते हैं, आपको ऐसा कौन-सा लक्षण दिख रहा है? मौसम विभाग के क्लर्क ने जवाब दिया, ‘हम लगातार देख रहे हैं कि इस बार पड़ोस के गांव में रहने वाले लोग पागलों की तरह लकड़ियां इकट्ठा कर रहे हैं!’

सबक़ ज़िंदगी का
1. आप जिसे अक्लमंद और ज्ञानी मान रहे हैं, हो सकता है कि वह आपसे ही अक्ल ले रहा हो।

2. किसी भी सूचना पर भरोसा करने से पहले उसके स्रोत के बारे में भी जान लें।


ख़ुशहाली का राज़

दोस्तों यह कहानी दैनिक भास्कर (१३-०९-२००९) से ली गई है|

ऑफिस में काम करते व़क्त राजन बड़ा उदास दिख रहा था। आख़िर उसके एक सहकर्मी मोहन ने पूछ ही लिया। राजन ने बड़े धीमे-धीमे कहना शुरू किया, ‘क्या बताऊं यार..मेरी जिंदगी तो नर्क बन गई है। घर में एक पल को भी चैन नही रहता।अपनी बीवी के साथ मेरी बिल्कुल नहीं बनती। हरदम खटपट होती रहती है। हम तो बच्चों की वजह से साथ हैं, वरना कब के अलग हो गए होते।मोहन ने कहा, ‘मामला तो गंभीर लगता है। मेरे साथ भी कुछ-कुछ ऐसा ही था, पर अब मेरा जीवन ख़ुशहाल है। तुम ऐसा करो, आज शाम को ऑफिस के बाद मेरे साथ चलना। फिर देखना कि मेरी ख़ुशहाली का राज़ क्या है।
शाम को ऑफिस से दोनों साथ ही निकले। घर पहुंचकर मोहन ने दरवाज़े पर ही अपनी पत्नी को बांहों में भर लिया और उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करते हुए बताने लगा कि आज ऑफिस में उसकी बहुत याद आई। यह सुनकर पत्नी की ख़ुशी का ठिकाना ही रहा। मियां-बीवी, दोनों चेहरे दमकने लगे। राजन और मोहन टीवी देखते हुए बातें करने लगे और मोहन की पत्नी रसोई में नाश्ता बनाने लगी। नाश्ता करते व़क्त मोहन ने फिर पत्नी की तारीफ़ की। उसने कहा कि उसकी उंगलियों में जादू है। और यह भी कि उसे जीवनसाथी के रूप में पाकर उसका जीवन धन्य हो गया। राजन पर इस सबका बड़ा असर पड़ा और उसने भी तारीफ़ और प्रेम-प्रदर्शन के ये उपाय घर में आज़माने का निर्णय कर लिया।
घर पहुंचकर उसने कॉलबेल बजाई। उसकी पत्नी ने जैसे ही दरवाज़ा खोला, उसने उसे बांहों में लिया और चुंबनों की झड़ी लगा दी। इसके साथ ही उसने तीन-चार बारआई लव यूभी बोल दिया और उसकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ भी कर डाली।
उसकी पत्नी कुछ देर के लिए तो अवाक रह गई, फिर सिर पकड़ कर रोने लगी। राजन हैरान। उसे तो उसके ख़ुश होने की उम्मीद थी। उसने रोने का कारण पूछा। पत्नी सुबकते हुए कहने लगी, ‘आज मेरे जीवन का सबसे ख़राब दिन है। सुबह साइकिल चलाते समय राजू के टखने में मोच गई। दोपहर को जब मैं लेटी हुई थी, नल का वाशर खराब हो जाने के कारण पूरे घर में पानी भर गया। और..और अब तुम शराब पीकर गए हो और पता नहीं क्या बक-झक कर रहे हो!’



सब़क ज़िंदगी का
1. एकदम से न बदलें। किसी का रातोरात बदल जाना संदेह पैदा करता है।
2. ज़रूरी नहीं कि एक ही उपाय सबके लिए कारगर हो।