
दोस्तों यह स्व० हबीब तनवीर साहब के शब्द है, जो की दैनिक भास्कर (२८-१०-२००९) में प्रकाशित हुए थे|
इश्क़ सादिक का दौरा इससे पहले भी मुझ पर पड़ चुका था। हमारे घर में एक तोता था, पिंजरें में चारों ओर चलता रहता और मज़े-मज़े की बातें करता। एक दिन मैंने देखा कि पिंजरा गायब, तोता गायब। अम्मा से, आपा से पूछा, दोनों अनजान।
मैंने बच्चों का आज़मूदा हरबा इस्तेमाल किया, यानी रोना शुरू कर दिया, फिर कोई असर नहीं, उल्टा अम्मा और आपा हंसने लगीं, मैं गुस्से में ओल-फोल बकने लगा। ख़ैर वह दिन टल गया, कई ह़फ्ते निकल गए, मैं बात को तकरीबन भूल-सा गया था। फिर एक दिन घर के एक कोने में पड़ा मुझे उस तोते का एक पर मिल गया, बस फिर रोना शुरू। आपा जान ने कहा, दोपहर में हमलोग लेट गए थे, एक बिल्ली आई और न जाने कैसे पिंजरा खोलकर तोता लेकर चली गई।
मैंने और भी ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। फिर यह दिन बीत गया। महीने दो महीने के बाद मैं दही लाने घर से भेजा गया था। मैं अभी हलवाई वाली लाइन की तरफ़ जा ही रहा था कि आवाज़ आई, बाबा कहां जा रहे हो? मैंने हैरत से चारों तरफ़ देखा, मुझे वही पिंजरा एक दुकान में लटका नज़र आया और उसके अंदर अपना तोता। मैं पास गया तो मुझसे और भी बहुत-सी बातें करने लगा, कहा, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ अम्मा ने उसे सिखा दिया था।
मैं दुकानदार से मुखातिब हुआ। मैं सोच रहा था कि तोते की ज़ात ख़्वाहमख़्वाह बदनाम है, मैंने जो अम्मा के मुंह से तोतों पर तोता चश्मी का इल्ज़ाम बारहा सुना था, मुझे वह बिल्कुल ग़लत नज़र आया। मैंने सोचा कम से कम एक मेरा तोता तो वफ़ादार है। मैंने बनिए से कहा- यह तोता हमारा है। बनिए ने कहा यह तुम कैसे कह सकते हो। मैंने कहा देखते नहीं तोता मुसलमान है। इस दौरान तोता कुछ बड़बड़ाता रहा, मैंने गौर से सुना तो सीता राम, सीता राम की रट लगा रहा था यानी तोता सेकुयूलर था। बनिए ने कहा यह तोता हमने अच्छी रक़म देकर खरीदा है। मैंने कहा- कब ख़रीदा, किस से ख़रीदा? बनिए ने कहा अभी दो महीने पहले ख़रीदा। बेचने वाले का नाम भी बताया, रमज़ान।
मैं चुपचाप घर आ गया। घर आकर अम्मा पर बरस पड़ा। तुमने तोते को बेच दिया, आपा जान झूठ बोल रही थी। अम्मा ने कहा हमने तोता हरगिज़ नहीं बेचा। आपा जान कहने लगीं, ‘अम्मा के आराम के व़क्त दोपहर को ऐसी कऱख्त आवाज़ से चीखता रहता था कि अम्मा की नींद हराम हो जाती थी। एक दिन रमज़ान इधर आया तो अम्मा ने उससे कहा कि इस तोते को तुम ले जाओ, आपा जान क़समें खाने लगीं कि तोते को बेचा हरगिज़-हरगिज़ नहीं है।’ मैं फिर रो पड़ा।
इश्क़ सादिक का दौरा इससे पहले भी मुझ पर पड़ चुका था। हमारे घर में एक तोता था, पिंजरें में चारों ओर चलता रहता और मज़े-मज़े की बातें करता। एक दिन मैंने देखा कि पिंजरा गायब, तोता गायब। अम्मा से, आपा से पूछा, दोनों अनजान।
मैंने बच्चों का आज़मूदा हरबा इस्तेमाल किया, यानी रोना शुरू कर दिया, फिर कोई असर नहीं, उल्टा अम्मा और आपा हंसने लगीं, मैं गुस्से में ओल-फोल बकने लगा। ख़ैर वह दिन टल गया, कई ह़फ्ते निकल गए, मैं बात को तकरीबन भूल-सा गया था। फिर एक दिन घर के एक कोने में पड़ा मुझे उस तोते का एक पर मिल गया, बस फिर रोना शुरू। आपा जान ने कहा, दोपहर में हमलोग लेट गए थे, एक बिल्ली आई और न जाने कैसे पिंजरा खोलकर तोता लेकर चली गई।
मैंने और भी ज़ोर से रोना शुरू कर दिया। फिर यह दिन बीत गया। महीने दो महीने के बाद मैं दही लाने घर से भेजा गया था। मैं अभी हलवाई वाली लाइन की तरफ़ जा ही रहा था कि आवाज़ आई, बाबा कहां जा रहे हो? मैंने हैरत से चारों तरफ़ देखा, मुझे वही पिंजरा एक दुकान में लटका नज़र आया और उसके अंदर अपना तोता। मैं पास गया तो मुझसे और भी बहुत-सी बातें करने लगा, कहा, ‘ला इलाहा इल्लल्लाह’ अम्मा ने उसे सिखा दिया था।
मैं दुकानदार से मुखातिब हुआ। मैं सोच रहा था कि तोते की ज़ात ख़्वाहमख़्वाह बदनाम है, मैंने जो अम्मा के मुंह से तोतों पर तोता चश्मी का इल्ज़ाम बारहा सुना था, मुझे वह बिल्कुल ग़लत नज़र आया। मैंने सोचा कम से कम एक मेरा तोता तो वफ़ादार है। मैंने बनिए से कहा- यह तोता हमारा है। बनिए ने कहा यह तुम कैसे कह सकते हो। मैंने कहा देखते नहीं तोता मुसलमान है। इस दौरान तोता कुछ बड़बड़ाता रहा, मैंने गौर से सुना तो सीता राम, सीता राम की रट लगा रहा था यानी तोता सेकुयूलर था। बनिए ने कहा यह तोता हमने अच्छी रक़म देकर खरीदा है। मैंने कहा- कब ख़रीदा, किस से ख़रीदा? बनिए ने कहा अभी दो महीने पहले ख़रीदा। बेचने वाले का नाम भी बताया, रमज़ान।
मैं चुपचाप घर आ गया। घर आकर अम्मा पर बरस पड़ा। तुमने तोते को बेच दिया, आपा जान झूठ बोल रही थी। अम्मा ने कहा हमने तोता हरगिज़ नहीं बेचा। आपा जान कहने लगीं, ‘अम्मा के आराम के व़क्त दोपहर को ऐसी कऱख्त आवाज़ से चीखता रहता था कि अम्मा की नींद हराम हो जाती थी। एक दिन रमज़ान इधर आया तो अम्मा ने उससे कहा कि इस तोते को तुम ले जाओ, आपा जान क़समें खाने लगीं कि तोते को बेचा हरगिज़-हरगिज़ नहीं है।’ मैं फिर रो पड़ा।
- हबीब तनवीर
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