दोस्तों यह कहानी दैनिक भास्कर (०१-११-२००९) से ली गई है|
एक बहुत बड़ा जहाज एक बार ख़राब हो गया। बड़े-बड़े इंजीनियरों ने सुधारने की कोशिश की, लेकिन कोई लाभ न हुआ। इसी बीच किसी ने मालिकों को एक बुजुर्ग का नाम सुझाया। वह इंजीनियर नहीं था। उसके पास कोई डिग्री-डिप्लोमा भी नहीं था। वह अपने समय का जाना-माना मैकेनिक था, और इस क्षेत्र में लंबे समय तक काम करने के बाद अब नाती-पोतों के साथ समय बिता रहा था। उसे बुलाया गया। उसकी दशा देखकर मालिकों को भरोसा ही नहीं हुआ कि वह इतने बड़े और जटिल जहाज के बारे कुछ जानता भी होगा।
बुजुर्ग ने भारी-भरकम इंजन का ऊपर से नीचे तक मुआयना किया। उसने हर चीज को टटोलकर देखा। उसने इंजन के पुर्जे नहीं खोले। इंजन का निरीक्षण समाप्त करने के बाद उसने अपना औजारों वाला बैग खोला और उसमें से एक छोटी-सी हथौड़ी निकाल ली। बुजुर्ग ने उस छोटी हथौड़ी से इंजन पर एक जगह हल्के प्रहार किए। और इसके साथ ही, वह घरघराकर चलने लगा।
यह इंसानी फ़ितरत ही है, जो काम हो जाने के बाद किसी के योगदान को कम आंकने लगती है। उन्हें लगा सिर्फ़ दो-तीन हथौड़ी मारने के 10 हजार रुपए! यह तो कोई ज्यादा काम नहीं हुआ। तो उन्होंने उस मैकेनिक को लिखा कि आप डिटेल बिल भेजें, जिसमें अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग चार्ज का विवरण हो। कुछ दिनों बाद उन्हें नया बिल मिला, जिसमें बुजुर्ग ने यह विवरण दिया था:
हथौड़ी से चोट करने के ..20 रुपए
यह जानने के लिए कि चोट कहां करनी है..9980 रुपए।
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